कानूनी
समाचार
| दिल्ली उच्च
न्यायालय
| सेवा एवं
आरक्षण
कानून
OBC-NCL
अभ्यर्थी को
दिल्ली हाईकोर्ट
से बड़ी
राहत:
DDA पटवारी भर्ती
मामले में
CAT का आदेश
रद्द
दिल्ली
हाईकोर्ट
ने
कहा—OBC-NCL
अभ्यर्थी
पर
EWS श्रेणी के
लिए
निर्धारित
पात्रता
संबंधी
शर्तों
को
लागू
करना
गलत;
अभ्यर्थी
की
उम्मीदवारी
निरस्त
करने
के
मूल
आदेश
में
दर्ज
कारणों
से
अलग
आधार
पर
उसकी
अस्वीकृति
को
उचित
नहीं
ठहराया
जा
सकता।
न्यायमूर्ति
सी.
हरि
शंकर
और
न्यायमूर्ति
विनोद
कुमार
की
खंडपीठ
ने
OBC-NCL अभ्यर्थी के
मामले
पर
नए
सिरे
से
विचार
करने
का
निर्देश
दिया;
DDA के अधिवक्ता
ने
भी
न्यायाधिकरण
के
आदेश
में
हुई
त्रुटि
स्वीकार
की।
नई
दिल्ली
| 1 नवंबर 2026
सरकारी
नौकरियों
में
अन्य
पिछड़ा
वर्ग–नॉन-क्रीमी
लेयर
(OBC-NCL) के अभ्यर्थियों
के
आरक्षण
संबंधी
अधिकारों
से
जुड़े
एक
महत्वपूर्ण
फैसले
में
दिल्ली
उच्च
न्यायालय
ने
केंद्रीय
प्रशासनिक
न्यायाधिकरण
(CAT) के उस
आदेश
को
रद्द
कर
दिया
है,
जिसके
द्वारा
दिल्ली
विकास
प्राधिकरण
(DDA) में पटवारी
पद
के
लिए
आवेदन
करने
वाले
एक
OBC-NCL अभ्यर्थी की
उम्मीदवारी
निरस्त
किए
जाने
के
विरुद्ध
दायर
याचिका
खारिज
कर
दी
गई
थी।
उच्च
न्यायालय
ने
पाया
कि
न्यायाधिकरण
ने
गलती
से
आर्थिक
रूप
से
कमजोर
वर्ग
(EWS) के अभ्यर्थियों
के
लिए
निर्धारित
पात्रता
संबंधी
शर्तों
को
OBC-NCL श्रेणी के
अभ्यर्थी
पर
लागू
कर
दिया
था।
न्यायालय
ने
प्रशासनिक
कानून
के
इस
स्थापित
सिद्धांत
को
भी
दोहराया
कि
किसी
प्रशासनिक
आदेश
की
वैधता
की
जांच
उसी
आदेश
में
मूल
रूप
से
दर्ज
कारणों
के
आधार
पर
की
जानी
चाहिए।
बाद
में
नए
कारण
प्रस्तुत
करके
उस
आदेश
को
उचित
नहीं
ठहराया
जा
सकता।
यह
महत्वपूर्ण
फैसला
6 जुलाई 2026 को
न्यायमूर्ति
सी.
हरि
शंकर
और
न्यायमूर्ति
विनोद
कुमार
की
खंडपीठ
ने
सिद्धार्थ
यादव
बनाम
दिल्ली
विकास
प्राधिकरण
(DDA) एवं अन्य,
रिट
याचिका
संख्या
W.P.(C) 7524/2026 में सुनाया।
याचिकाकर्ता
सिद्धार्थ
यादव
की
ओर
से
अधिवक्ता
अनुज
अग्रवाल
ने
न्यायालय
में
पक्ष
रखा
और
दलीलें
प्रस्तुत
कीं।
उनके
साथ
अधिवक्ता
दिव्या
अग्रवाल,
शुभम
बहल,
प्रदीप
कुमार,
कृतिका
मट्टा,
अंजलि
बंसल,
तान्या
रोज़,
भूमिका
कुंद्रा,
निखिल
पवार,
शाकिब
मलिक,
लवकेश
चौहान
और
मानस
वर्मा
भी
उपस्थित
थे।
निर्धारित
अवधि के
भीतर OBC-NCL प्रमाणपत्र
जारी होने
के बावजूद
उम्मीदवारी निरस्त
यह
विवाद
दिल्ली
विकास
प्राधिकरण
में
पटवारी
पदों
की
भर्ती
प्रक्रिया
से
संबंधित
है।
याचिकाकर्ता
सिद्धार्थ
यादव
ने
OBC-NCL श्रेणी के
अभ्यर्थी
के
रूप
में
आवेदन
किया
था
और
भर्ती
विज्ञापन
के
अंतर्गत
उपलब्ध
आरक्षण
का
लाभ
मांगा
था।
भर्ती
विज्ञापन
की
शर्तों
के
अनुसार,
OBC-NCL श्रेणी के
अभ्यर्थियों
के
लिए
सक्षम
प्राधिकारी
द्वारा
जारी
किया
गया
प्रमाणपत्र
1 अप्रैल 2025 से
5 नवंबर 2025 के
बीच
का
होना
आवश्यक
था।
याचिकाकर्ता
के
अनुसार,
उनका
OBC-NCL प्रमाणपत्र 19 अप्रैल
2025 को जारी
हुआ
था,
जो
निर्धारित
अवधि
के
अंतर्गत
आता
था।
इसके
बावजूद
DDA ने 20 मार्च
2026 के पत्र
द्वारा
उनकी
उम्मीदवारी
इस
आधार
पर
निरस्त
कर
दी
कि
उनका
OBC-NCL प्रमाणपत्र निर्धारित
अवधि
के
भीतर
जारी
नहीं
हुआ
था।
इस
निर्णय
से
व्यथित
होकर
सिद्धार्थ
यादव
ने
केंद्रीय
प्रशासनिक
न्यायाधिकरण
में
मूल
आवेदन
संख्या
O.A. 1239/2026 दाखिल किया।
हालांकि,
न्यायाधिकरण
ने
6 अप्रैल 2026 के
आदेश
द्वारा
उनका
आवेदन
खारिज
कर
दिया।
इसके
बाद
अभ्यर्थी
ने
न्यायाधिकरण
के
आदेश
को
दिल्ली
उच्च
न्यायालय
में
चुनौती
दी।
OBC-NCL
अभ्यर्थी पर
EWS की शर्तें
लागू करना
गलत:
दिल्ली हाईकोर्ट
उच्च
न्यायालय
के
समक्ष
विवाद
का
एक
प्रमुख
प्रश्न
यह
था
कि
क्या
न्यायाधिकरण
ने
भर्ती
विज्ञापन
में
निर्धारित
आरक्षण
संबंधी
शर्तों
को
सही
ढंग
से
लागू
किया
था।
न्यायाधिकरण
ने
याचिकाकर्ता
का
आवेदन
इस
आधार
पर
खारिज
किया
था
कि
उनका
प्रमाणपत्र
वित्तीय
वर्ष
2025–2026 से संबंधित
था,
जबकि
न्यायाधिकरण
के
अनुसार
संबंधित
स्थिति
का
निर्धारण
वित्तीय
वर्ष
2024–2025 के आधार
पर
होना
आवश्यक
था।
उच्च
न्यायालय
ने
पाया
कि
न्यायाधिकरण
ने
संभवतः
EWS श्रेणी के
लिए
निर्धारित
शर्त
को
OBC-NCL प्रमाणपत्र पर
लागू
कर
दिया
था।
खंडपीठ
ने
अपने
निर्णय
में
स्पष्ट
रूप
से
कहा:
“इसके
अतिरिक्त,
ऐसा
प्रतीत
होता
है
कि
न्यायाधिकरण
ने
OBC-NCL प्रमाणपत्र पर
वह
कसौटी
लागू
कर
दी,
जो
अधिसूचना
के
अनुसार
EWS अभ्यर्थियों के
लिए
निर्धारित
थी।”
विशेष
रूप
से,
DDA की ओर
से
उपस्थित
अधिवक्ता
ने
भी
उच्च
न्यायालय
के
समक्ष
स्वीकार
किया
कि
न्यायाधिकरण
से
यह
त्रुटि
हुई
थी।
यह
टिप्पणी
इसलिए
महत्वपूर्ण
है
क्योंकि
सरकारी
भर्ती
में
विभिन्न
आरक्षण
श्रेणियों
की
पात्रता
का
निर्धारण
उनके
लिए
निर्धारित
संबंधित
नियमों
और
शर्तों
के
अनुसार
ही
किया
जाना
चाहिए।
OBC-NCL
अभ्यर्थियों
पर
EWS अभ्यर्थियों के
लिए
निर्धारित
शर्तों
को
बिना
विधिक
आधार
के
लागू
नहीं
किया
जा
सकता।
OBC-NCL
अभ्यर्थी की
उम्मीदवारी निरस्त
करने के
कारण बाद
में नहीं
बदले जा
सकते
उच्च
न्यायालय
ने
न्यायाधिकरण
के
आदेश
में
एक
दूसरी
महत्वपूर्ण
कानूनी
त्रुटि
भी
पाई।
DDA
ने
मूल
रूप
से
याचिकाकर्ता
की
उम्मीदवारी
केवल
इस
आधार
पर
निरस्त
की
थी
कि
उनका
OBC-NCL प्रमाणपत्र निर्धारित
अवधि
के
भीतर
जारी
नहीं
हुआ
था।
लेकिन
न्यायाधिकरण
ने
इस
बात
की
जांच
करने
के
बजाय
कि
प्रमाणपत्र
वास्तव
में
निर्धारित
अवधि
के
भीतर
जारी
हुआ
था
या
नहीं,
याचिका
को
एक
बिल्कुल
अलग
आधार
पर
खारिज
कर
दिया।
न्यायाधिकरण
ने
प्रमाणपत्र
से
संबंधित
वित्तीय
वर्ष
को
आधार
बनाया,
जबकि
DDA के मूल
अस्वीकृति
आदेश
में
यह
कारण
दर्ज
नहीं
था।
उच्च
न्यायालय
ने
कहा
कि
न्यायाधिकरण
ने
उम्मीदवारी
निरस्त
करने
के
मूल
कारण
से
अलग
आधार
पर
मामले
का
निर्णय
किया,
जो
सामान्यतः
स्वीकार्य
नहीं
है।
इस
संदर्भ
में
न्यायालय
ने
सर्वोच्च
न्यायालय
के
दो
महत्वपूर्ण
निर्णयों
का
उल्लेख
किया:
- Commissioner of Police v. Gordhandas
Bhanji, AIR 1952 SC 16
- Mohinder Singh Gill v. Chief Election
Commissioner, (1978) 1 SCC 405
उच्च
न्यायालय
ने
स्थापित
सिद्धांत
को
दोहराते
हुए
कहा:
“यह
स्थापित
कानून
है
कि
किसी
आदेश
की
वैधता
का
निर्धारण
उसी
आदेश
में
दर्ज
कारणों
के
आधार
पर
किया
जाएगा।
आदेश
उन्हीं
कारणों
के
आधार
पर
वैध
माना
जाएगा
या
निरस्त
होगा।”
न्यायालय
ने
आगे
कहा:
“सामान्यतः
न्यायाधिकरण
के
लिए
यह
उचित
नहीं
होगा
कि
वह
याचिकाकर्ता
की
उम्मीदवारी
निरस्त
किए
जाने
की
वैधता
की
जांच
उस
आधार
से
अलग
किसी
अन्य
आधार
पर
करे,
जिस
पर
वास्तव
में
उम्मीदवारी
निरस्त
की
गई
थी।”
इस
प्रकार
उच्च
न्यायालय
ने
स्पष्ट
किया
कि
प्रशासनिक
प्राधिकारी
द्वारा
पारित
आदेश
की
वैधता
को
बाद
में
नए
कारण
प्रस्तुत
करके
सामान्यतः
उचित
नहीं
ठहराया
जा
सकता।
यह
सिद्धांत
सरकारी
भर्ती
और
सेवा
संबंधी
मामलों
में
निष्पक्षता
सुनिश्चित
करने
के
लिए
अत्यंत
महत्वपूर्ण
है।
CAT
का आदेश
रद्द; OBC-NCL अभ्यर्थी
के मामले
पर नए
सिरे से
सुनवाई का
निर्देश
इन
कानूनी
त्रुटियों
को
ध्यान
में
रखते
हुए
दिल्ली
उच्च
न्यायालय
ने
पक्षकारों
की
सहमति
से
केंद्रीय
प्रशासनिक
न्यायाधिकरण
का
6 अप्रैल 2026 का
आदेश
रद्द
कर
दिया।
न्यायालय
ने
मूल
आवेदन
संख्या
O.A. 1239/2026 को न्यायाधिकरण
के
समक्ष
वापस
भेजते
हुए
निर्देश
दिया
कि
वह
सिद्धार्थ
यादव
की
उम्मीदवारी
निरस्त
किए
जाने
की
वैधता
पर
नए
सिरे
से
विचार
करे।
चूंकि
मामला
सरकारी
भर्ती
और
चयन
प्रक्रिया
से
संबंधित
था,
इसलिए
उच्च
न्यायालय
ने
शीघ्र
सुनवाई
की
आवश्यकता
पर
भी
जोर
दिया।
खंडपीठ
ने
दोनों
पक्षों
को
16 जुलाई 2026 को
न्यायाधिकरण
के
समक्ष
उपस्थित
होने
का
निर्देश
दिया।
इसके
अतिरिक्त,
न्यायालय
ने
निर्देश
दिया
कि
उस
दिन
कोई
भी
पक्ष
सुनवाई
स्थगित
करने
की
मांग
नहीं
करेगा।
न्यायाधिकरण
से
अनुरोध
किया
गया
कि
वह
मामले
की
सुनवाई
करके
यथाशीघ्र
निर्णय
सुनाए।
उल्लेखनीय
है
कि
उच्च
न्यायालय
ने
स्वयं
याचिकाकर्ता
की
नियुक्ति
का
निर्देश
नहीं
दिया
और
न
ही
उनकी
पात्रता
का
अंतिम
निर्धारण
किया।
न्यायालय
ने
यह
सुनिश्चित
किया
कि
OBC-NCL अभ्यर्थी की
उम्मीदवारी
निरस्त
किए
जाने
की
वैधता
की
जांच
सही
कानूनी
प्रावधानों
और
मूल
अस्वीकृति
आदेश
में
दर्ज
कारणों
के
आधार
पर
की
जाए।
सरकारी
भर्तियों में
OBC-NCL अभ्यर्थियों के
लिए महत्वपूर्ण
फैसला
दिल्ली
उच्च
न्यायालय
का
यह
निर्णय
उन
OBC-NCL अभ्यर्थियों के
लिए
विशेष
महत्व
रखता
है,
जिनकी
उम्मीदवारी
नॉन-क्रीमी
लेयर
प्रमाणपत्र
की
जारी
होने
की
तारीख,
उसकी
वैधता
अथवा
भर्ती
विज्ञापन
की
शर्तों
के
संबंध
में
उत्पन्न
विवादों
के
कारण
निरस्त
कर
दी
जाती
है।
यह
निर्णय
सरकारी
भर्ती
और
आरक्षण
संबंधी
विवादों
में
तीन
महत्वपूर्ण
कानूनी
सिद्धांतों
को
पुनः
स्थापित
करता
है।
1.
OBC-NCL और EWS की
पात्रता
संबंधी
शर्तें
अलग
हैं।
भर्ती
प्राधिकरणों
तथा
न्यायाधिकरणों
को
प्रत्येक
अभ्यर्थी
की
पात्रता
का
निर्धारण
उसकी
संबंधित
आरक्षण
श्रेणी
के
लिए
निर्धारित
नियमों
के
अनुसार
करना
चाहिए।
2.
OBC-NCL अभ्यर्थी की
उम्मीदवारी
निरस्त
करने
के
मूल
कारणों
को
बाद
में
नहीं
बदला
जा
सकता।
किसी
अभ्यर्थी
की
उम्मीदवारी
निरस्त
करने
के
आदेश
को
सामान्यतः
उन
नए
कारणों
के
आधार
पर
उचित
नहीं
ठहराया
जा
सकता,
जो
मूल
आदेश
में
दर्ज
ही
नहीं
थे।
3.
सरकारी
भर्ती
में
निष्पक्षता
और
समयबद्ध
न्यायिक
प्रक्रिया
आवश्यक
है।
सभी
अभ्यर्थियों
की
पात्रता
की
जांच
भर्ती
विज्ञापन
की
सही
शर्तों
के
आधार
पर
की
जानी
चाहिए।
चयन
प्रक्रिया
से
संबंधित
विवादों
का
यथाशीघ्र
निपटारा
भी
आवश्यक
है।
यह
निर्णय
विशेष
रूप
से
उन
मामलों
में
प्रासंगिक
है,
जहां
OBC-NCL अभ्यर्थियों को
प्रमाणपत्र
जारी
होने
की
तारीख,
वित्तीय
वर्ष
अथवा
आरक्षण
श्रेणी
से
संबंधित
अलग-अलग
शर्तों
के
आधार
पर
कठिनाइयों
का
सामना
करना
पड़ता
है।
हालांकि,
इस
निर्णय
का
अर्थ
यह
नहीं
है
कि
भर्ती
विज्ञापन
की
शर्तों
का
पालन
किए
बिना
प्रत्येक
OBC-NCL प्रमाणपत्र स्वीकार
करना
अनिवार्य
है।
इस
फैसले
का
मुख्य
महत्व
यह
है
कि
OBC-NCL अभ्यर्थियों की
पात्रता
की
जांच
उनकी
आरक्षण
श्रेणी
पर
लागू
सही
नियमों
के
अनुसार
की
जाए
और
उनकी
उम्मीदवारी
निरस्त
करने
की
वैधता
का
परीक्षण
उन्हीं
कारणों
के
आधार
पर
हो,
जो
मूल
अस्वीकृति
आदेश
में
दर्ज
किए
गए
थे।
इस
प्रकार,
दिल्ली
उच्च
न्यायालय
ने
न्यायाधिकरण
का
आदेश
रद्द
करके
एक
बार
फिर
यह
स्पष्ट
किया
है
कि
सरकारी
भर्ती
में
OBC-NCL अभ्यर्थियों को
लागू
नियमों
के
अनुसार
निष्पक्ष
विचार
और
विधिसम्मत
निर्णय
प्राप्त
करने
का
अधिकार
है।
मामले
की प्रमुख
जानकारी
|
विवरण |
जानकारी |
|
मामला |
सिद्धार्थ
यादव बनाम
दिल्ली विकास
प्राधिकरण एवं
अन्य |
|
न्यायालय |
दिल्ली
उच्च न्यायालय |
|
वाद
संख्या |
W.P.(C)
7524/2026 |
|
निर्णय
की तारीख |
6
जुलाई 2026 |
|
न्यायाधीश |
न्यायमूर्ति
सी. हरि
शंकर एवं
न्यायमूर्ति विनोद
कुमार |
|
भर्ती |
DDA
पटवारी |
|
आरक्षण
श्रेणी |
OBC–नॉन-क्रीमी
लेयर (OBC-NCL) |
|
प्रमाणपत्र
जारी होने
की तारीख |
19
अप्रैल 2025 |
|
उम्मीदवारी
निरस्त करने
की तारीख |
20
मार्च 2026 |
|
याचिकाकर्ता
की ओर
से अधिवक्ता |
अनुज
अग्रवाल एवं
उनकी अधिवक्ता
टीम |
|
न्यायालय
का निर्णय |
CAT
का आदेश
रद्द; नए
सिरे से
सुनवाई का
निर्देश |
कानूनी
प्रतिनिधित्व
एवं
संपर्क
विवरण
अनुज
अग्रवाल एंड
कंपनी
अधिवक्तागण
(Advocates)
कार्यालय
का
पता
K-17,
द्वितीय
तल,
जंगपुरा
एक्सटेंशन,
नई
दिल्ली
– 110014
दिल्ली
उच्च
न्यायालय
चैंबर्स
483,
ब्लॉक-II,
लॉयर्स
चैंबर्स,
दिल्ली
उच्च
न्यायालय,
नई
दिल्ली
– 110003
मोबाइल:
9891403206
anujaggarwal1984@gmail.com
anujaggarwalcompany@gmail.com
वेबसाइट:
advocateanujaggarwal.com
संपादकीय
टिप्पणी:
यह
समाचार
दिल्ली
उच्च
न्यायालय
के
6 जुलाई 2026 के
निर्णय
पर
आधारित
है।
उच्च
न्यायालय
ने
CAT का आदेश
रद्द
कर
मामले
को
पुनर्विचार
हेतु
वापस
भेजा
था;
उसने
याचिकाकर्ता
की
नियुक्ति
का
अंतिम
आदेश
नहीं
दिया।
पुनर्विचार
के
बाद
की
कार्यवाही
का
परिणाम
सत्यापित
नहीं
किया
गया
है।
अधिवक्ता
कार्यालय
का
संपर्क
विवरण
समाचार
से
अलग
दिया
गया
है।

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