Sunday, November 1, 2026

कैट ने शिक्षक पद के अभ्यर्थी पर डीएसएसएसबी द्वारा लगाया गया 15 वर्ष का परीक्षा प्रतिबंध रद्द किया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन पाया

 


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कैट ने शिक्षक पद के अभ्यर्थी पर डीएसएसएसबी द्वारा लगाया गया 15 वर्ष का परीक्षा प्रतिबंध रद्द किया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन पाया

न्यायाधिकरण ने कहा—बिना कारण बताओ नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए 15 वर्ष जैसा कठोर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता; कार्यकारी निर्देश गंभीर दंड लगाने के लिए आवश्यक वैधानिक अधिकार का विकल्प नहीं हो सकते।

नई दिल्ली | 1 नवंबर 2026

सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में निष्पक्षता, प्रशासनिक शक्तियों की सीमाओं और अभ्यर्थियों के कानूनी अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण निर्णय में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) द्वारा एक शिक्षक पद के अभ्यर्थी पर लगाया गया 15 वर्ष का परीक्षा प्रतिबंध रद्द कर दिया है।

न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना और दंड लगाने के लिए आवश्यक वैधानिक अधिकार स्थापित किए बिना किसी अभ्यर्थी पर इतना कठोर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।

यह निर्णय 15 जुलाई 2026 को माननीय श्री मनीष गर्ग, सदस्य (न्यायिक), और माननीय डॉ. आनंद एस. खाती, सदस्य (प्रशासनिक), की खंडपीठ ने सोमबीर बनाम दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड, मूल आवेदन संख्या 327/2020 में सुनाया।

न्यायाधिकरण ने प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (TGT), सामाजिक विज्ञान (पुरुष) पद के अभ्यर्थी सोमबीर की याचिका स्वीकार करते हुए डीएसएसएसबी के 15 नवंबर 2019 के आदेश को, जहां तक उसका संबंध सोमबीर से था, निरस्त कर दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शुभम बहल, निखिल पवार और तान्या रोज़ न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित हुए।

परीक्षा केंद्र पर हुई घटना के बाद लगाया गया था 15 वर्ष का प्रतिबंध

यह विवाद डीएसएसएसबी द्वारा विज्ञापन संख्या 04/2017 के अंतर्गत टीजीटी (सामाजिक विज्ञान) (पुरुष), पोस्ट कोड 137/17, के पदों पर भर्ती से संबंधित था।

सोमबीर ने निर्धारित शैक्षणिक योग्यता रखने के आधार पर उक्त पद के लिए आवेदन किया था, जिसे भर्ती बोर्ड ने स्वीकार कर लिया था।

9 सितंबर 2018 को दिल्ली के आनंद विहार स्थित एक परीक्षा केंद्र पर एक घटना हुई, जिसके बाद भारतीय दंड संहिता की धाराओं 186, 341 और 34 के अंतर्गत प्राथमिकी संख्या 0316/2018 दर्ज की गई।

याचिकाकर्ता का कहना था कि प्राथमिकी में न तो उसे आरोपी के रूप में नामित किया गया था और न ही उसके विरुद्ध किसी विशेष प्रकार के कदाचार का आरोप लगाया गया था।

उसने यह भी बताया कि कुछ अन्य अभ्यर्थियों के साथ उसने स्वयं पुलिस को सूचना दी थी और न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत उसके कथन के अनुसार, आपराधिक मामले में कोई आरोपपत्र भी दाखिल नहीं किया गया था।

इसके बावजूद, डीएसएसएसबी ने 15 नवंबर 2019 को एक आदेश जारी करके सोमबीर सहित 14 अभ्यर्थियों को 9 सितंबर 2018 से अगले 15 वर्षों तक बोर्ड की भविष्य की भर्ती परीक्षाओं में सम्मिलित होने से प्रतिबंधित कर दिया।

याचिकाकर्ता ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए कहा कि इतना कठोर दंड लगाने से पहले न तो उसे कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया गया।

डीएसएसएसबी ने कदाचार के प्रति शून्य-सहनशीलता नीति का हवाला दिया

याचिका का विरोध करते हुए डीएसएसएसबी ने तर्क दिया कि संबंधित कार्रवाई परीक्षा केंद्र अधीक्षक की रिपोर्ट के आधार पर की गई थी।

बोर्ड के अनुसार, कुछ अभ्यर्थियों ने जबरन परीक्षा कक्षों में प्रवेश किया, परीक्षा प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न की तथा सीलबंद प्रश्नपत्रों के वितरण को रोका।

डीएसएसएसबी ने परीक्षा संबंधी कदाचार के लिए निर्धारित अपने निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अभ्यर्थियों को अयोग्य घोषित करने और भविष्य की परीक्षाओं से प्रतिबंधित करने का प्रावधान है।

बोर्ड का यह भी तर्क था कि घटना की गंभीरता को देखते हुए तत्काल कार्रवाई उचित थी और अलग से व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देना आवश्यक नहीं था।

हालांकि, न्यायाधिकरण ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि केवल परीक्षा संबंधी निर्देशों में दंड का प्रावधान होने के कारण किसी भर्ती प्राधिकरण को निष्पक्ष प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने से छूट मिल सकती है।

कठोर दंड देने से पहले सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य

दोनों पक्षों की दलीलों और अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद न्यायाधिकरण ने पाया कि डीएसएसएसबी की कार्रवाई दंडात्मक प्रकृति की थी।

खंडपीठ ने कहा कि जिस प्रशासनिक निर्णय के गंभीर दंडात्मक परिणाम हों, उसे पारित करने से पहले प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।

न्यायाधिकरण ने पाया कि सोमबीर को न तो कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था और न ही आरोपों के संबंध में कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया था।

न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि किसी नियम या निर्देश में संभावित दंड का उल्लेख होने मात्र से निष्पक्ष सुनवाई की आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती।

खंडपीठ ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि संबंधित प्राथमिकी में सोमबीर को आरोपी के रूप में नामित नहीं किया गया था और न ही उसमें उसके विरुद्ध किसी विशिष्ट कदाचार का आरोप लगाया गया था।

ऐसी परिस्थितियों में बोर्ड का यह दायित्व था कि 15 वर्ष जैसा कठोर प्रतिबंध लगाने से पहले मामले की निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ जांच एवं समीक्षा की जाती।

कार्यकारी निर्देश वैधानिक अधिकार का स्थान नहीं ले सकते

इस निर्णय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी पहलू प्रशासनिक अधिकारियों की दंड लगाने की शक्ति से संबंधित है।

न्यायाधिकरण ने पाया कि डीएसएसएसबी ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान प्रस्तुत नहीं कर सका, जिसके आधार पर अभ्यर्थी को 15 वर्षों तक भर्ती परीक्षाओं से प्रतिबंधित करने का अधिकार बोर्ड को प्राप्त हो।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर गंभीर दंडात्मक परिणाम वाली कार्रवाई करने के लिए कानून का अधिकार आवश्यक है। केवल प्रशासनिक या कार्यकारी निर्देशों के आधार पर ऐसा दंड नहीं लगाया जा सकता।

न्यायाधिकरण ने उस स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया कि कार्यकारी निर्देश वैधानिक प्रावधानों की पूर्ति कर सकते हैं, लेकिन उनका स्थान नहीं ले सकते और न ही उन्हें निरस्त या अप्रभावी कर सकते हैं।

इस प्रकार न्यायाधिकरण ने डीएसएसएसबी की कार्रवाई में दो महत्वपूर्ण कानूनी कमियां पाईं—पहली, अभ्यर्थी को सुनवाई का उचित अवसर नहीं दिया गया; और दूसरी, 15 वर्ष का प्रतिबंध लगाने के लिए आवश्यक वैधानिक अधिकार स्थापित नहीं किया गया।

न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत परीक्षा संबंधी निर्देशों में निर्धारित अवधि के लिए प्रतिबंध का उल्लेख था, जो 10 वर्ष तक बढ़ सकता था, जबकि याचिकाकर्ता पर 15 वर्ष का प्रतिबंध लगाया गया था।

डीएसएसएसबी को दोबारा कार्रवाई शुरू करने की अनुमति देने से इनकार

सुनवाई के दौरान डीएसएसएसबी ने न्यायाधिकरण से अनुरोध किया कि उसे अब नया कारण बताओ नोटिस जारी करके सोमबीर के विरुद्ध दोबारा कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दी जाए।

न्यायाधिकरण ने यह अनुरोध भी अस्वीकार कर दिया।

खंडपीठ ने कहा कि इतने विलंब के बाद इस प्रकार का अनुरोध स्वीकार नहीं किया जा सकता, विशेष रूप से तब, जब बोर्ड 15 वर्ष का दंडात्मक प्रतिबंध लगाने के लिए आवश्यक वैधानिक प्रावधान तक प्रस्तुत नहीं कर सका हो।

इसके परिणामस्वरूप न्यायाधिकरण ने डीएसएसएसबी के 15 नवंबर 2019 के आदेश को सोमबीर के संबंध में रद्द करते हुए उस पर लगाया गया 15 वर्ष का परीक्षा प्रतिबंध समाप्त कर दिया।

हालांकि, न्यायाधिकरण द्वारा दिया गया यह राहत आदेश केवल याचिकाकर्ता सोमबीर से संबंधित था। मूल आदेश में शामिल अन्य अभ्यर्थियों के अधिकारों के संबंध में इस निर्णय में कोई अंतिम निर्धारण नहीं किया गया।

आयु सीमा में छूट देने के अनुरोध पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का निर्देश

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि मूल आवेदन लंबे समय तक लंबित रहने के कारण सोमबीर अब भर्ती परीक्षाओं के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा पार कर चुका है।

इस परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए न्यायाधिकरण ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता आयु सीमा में छूट प्राप्त करने के लिए संबंधित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करता है, तो उस पर लागू नियमों और विनियमों के अनुसार सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाना चाहिए।

हालांकि, न्यायाधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि इस टिप्पणी के आधार पर याचिकाकर्ता को आयु सीमा में छूट प्राप्त करने का स्वतः अधिकार नहीं मिलेगा।

ऐसी छूट प्रदान करने का निर्णय संबंधित कानून और नियमों के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी के विवेकाधिकार पर निर्भर करेगा।

सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण निर्णय

यह फैसला सरकारी नौकरी के इच्छुक अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा और भर्ती एजेंसियों की प्रशासनिक शक्तियों को कानून के दायरे में रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि भर्ती संस्थाओं को परीक्षा संबंधी कदाचार के विरुद्ध उचित कार्रवाई करने का अधिकार अवश्य है, लेकिन ऐसी कार्रवाई निष्पक्ष प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय और वैधानिक अधिकार के अनुरूप होनी चाहिए।

किसी अभ्यर्थी के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाए जाने मात्र से उसे अपना पक्ष रखने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

प्रत्येक मामले में संबंधित अभ्यर्थी की व्यक्तिगत भूमिका पर निष्पक्ष रूप से विचार करना आवश्यक है।

यह निर्णय इस महत्वपूर्ण अंतर को भी रेखांकित करता है कि किसी प्रशासनिक निर्देश में कदाचार के लिए दंड का उल्लेख होना और उस दंड को कानून के अनुसार वैध रूप से लागू करने की शक्ति होना, दोनों अलग-अलग विषय हैं।

यह फैसला परीक्षा संबंधी कथित कदाचार, मनमाने प्रतिबंध, लंबे समय तक भर्ती परीक्षाओं से वंचित किए जाने तथा सुनवाई के अवसर से इनकार किए जाने से संबंधित विवादों में महत्वपूर्ण कानूनी मार्गदर्शन प्रदान करता है।

15 वर्ष का प्रतिबंध रद्द करके केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने एक बार फिर स्थापित किया है कि सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में अनुशासनात्मक कार्रवाई कानून के शासन, वैधानिक अधिकार तथा प्राकृतिक न्याय के मूलभूत सिद्धांतों के अधीन ही की जा सकती है।

मामले का संक्षिप्त विवरण

विवरण

जानकारी

मामले का नाम

सोमबीर बनाम डीएसएसएसबी

मूल आवेदन संख्या

327/2020

न्यायिक मंच

केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण, प्रधान पीठ, नई दिल्ली

निर्णय की तारीख

15 जुलाई 2026

न्यायिक पीठ

माननीय श्री मनीष गर्ग, सदस्य (न्यायिक) तथा माननीय डॉ. आनंद एस. खाती, सदस्य (प्रशासनिक)

याचिकाकर्ता

सोमबीर

प्रतिवादी

दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता

शुभम बहल, निखिल पवार एवं तान्या रोज़

प्रतिवादी के अधिवक्ता

जी. सी. झा

चुनौती दिया गया आदेश

15 नवंबर 2019

अंतिम निर्णय

15 वर्ष का प्रतिबंध रद्द, मूल आवेदन स्वीकार

कानूनी प्रतिनिधित्व एवं संपर्क विवरण

अनुज अग्रवाल एंड कंपनी (Anuj Aggarwal & Company)
अधिवक्तागण (Advocates)

कार्यालय 1:
के-17, द्वितीय तल,
जंगपुरा एक्सटेंशन,
नई दिल्ली – 110014

कार्यालय 2:
483,
ब्लॉक-II, लॉयर्स चैंबर्स,
दिल्ली उच्च न्यायालय,
नई दिल्ली – 110003

मोबाइल: 9891403206

ईमेल:
anujaggarwal1984@gmail.com
anujaggarwalcompany@gmail.com

वेबसाइट: advocateanujaggarwal.com

संपादकीय टिप्पणी: यह समाचार केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण द्वारा 15 जुलाई 2026 को मूल आवेदन संख्या 327/2020 में पारित निर्णय पर आधारित है। अधिवक्ताओं के नाम न्यायाधिकरण के आदेश के अनुसार दिए गए हैं। फर्म का संपर्क विवरण प्रकाशन के लिए अलग से उपलब्ध कराया गया है। न्यायाधिकरण ने न तो आयु सीमा में स्वतः छूट प्रदान की है और न ही नियुक्ति का आदेश दिया है।

 

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