कैट ने
अतिथि शिक्षकों
को दी
बड़ी अंतरिम
राहत, यूपीएससी
की उप-प्रधानाचार्य
भर्ती प्रक्रिया
में भाग
लेने की
अनुमति
केंद्रीय प्रशासनिक
अधिकरण ने
अतिथि शिक्षकों
के अध्यापन
अनुभव को
पूरी तरह
बाहर रखने
की शर्त
पर उठाए
सवाल; कहा—नियमित
रूप से
कार्यरत अतिथि
शिक्षकों और
विजिटिंग गेस्ट
फैकल्टी के
बीच अंतर
की विस्तृत
न्यायिक जांच
आवश्यक
दिल्ली के
सरकारी विद्यालयों
में उप-प्रधानाचार्य
के 704
पदों पर
भर्ती के
मामले में
नौ अतिथि
शिक्षकों को
अंतरिम संरक्षण;
अंतिम निर्णय
तक चयन
परिणाम सीलबंद
लिफाफे में
रखने का
निर्देश
नई दिल्ली
|
1 नवंबर 2026
दिल्ली के
सरकारी
विद्यालयों
में
उप-प्रधानाचार्यों
की
भर्ती
से
जुड़े
एक
महत्वपूर्ण
मामले
में
केंद्रीय प्रशासनिक
अधिकरण
(CAT),
प्रधान पीठ,
नई दिल्ली
ने नौ
अतिथि शिक्षकों
को संघ
लोक सेवा
आयोग
(UPSC)
द्वारा आयोजित
भर्ती प्रक्रिया
में भाग
लेने की
अनुमति प्रदान
की है।
यह अंतरिम
राहत
ऐसे
समय
में
दी
गई,
जब
भर्ती
विज्ञापन
की
एक
शर्त
के
कारण
अतिथि
शिक्षकों
के
अध्यापन
अनुभव
को
मान्यता
न
दिए
जाने
और
उन्हें
चयन
प्रक्रिया
से
बाहर
किए
जाने
की
आशंका
थी।
12 अगस्त
2026 को
पारित
यह
आदेश
न्यायिक सदस्य
श्री मनीष
गर्ग और
प्रशासनिक सदस्य
डॉ.
आनंद एस.
खाती की
पीठ
ने
प्रज्ञा वर्मा
एवं अन्य
बनाम संघ
लोक सेवा
आयोग एवं
अन्य, मूल
आवेदन
संख्या
2999/2026
में
दिया।
आवेदकों की
ओर से
अधिवक्ता अनुज
अग्रवाल ने
पैरवी की।
उनके साथ
अधिवक्ता शुभम
बहल, निखिल
पवार, तान्या
रोज़, शाकिब
मलिक और
प्रदीप कुमार
उपस्थित थे।
यह विवाद
यूपीएससी
के
विज्ञापन संख्या
51/2026 से
संबंधित
है,
जिसके
अंतर्गत
दिल्ली
सरकार
के
शिक्षा
निदेशालय
में
प्रधानाचार्य के
124
पदों और
उप-प्रधानाचार्य
के 704
पदों पर
नियुक्ति
के
लिए
आवेदन
आमंत्रित
किए
गए
थे।
अधिकरण ने
प्रथम
दृष्टया
माना
कि
अतिथि
शिक्षकों
द्वारा
अर्जित
अनुभव
को
भर्ती
नियमों
में
स्पष्ट
रूप
से
बाहर
न
किए
जाने
संबंधी
आवेदकों
के
तर्क
को
प्रारंभिक
स्तर
पर
नजरअंदाज
नहीं
किया
जा
सकता।
अध्यापन अनुभव
को मान्यता
देने पर
विवाद
विवाद की
शुरुआत
यूपीएससी
के
भर्ती
विज्ञापन
में
दी
गई
उस
शर्त
से
हुई,
जिसके
अनुसार
अंशकालिक
आधार
पर,
दैनिक
वेतन
पर
अथवा
विजिटिंग
या
गेस्ट
फैकल्टी
के
रूप
में
अर्जित
अनुभव
को
साक्षात्कार
के
लिए
उम्मीदवारों
की
छंटनी
करते
समय
मान्य
अनुभव
में
शामिल
नहीं
किया
जाएगा।
दिल्ली सरकार
के
शिक्षा
निदेशालय
के
अंतर्गत
विद्यालयों
में
कार्यरत
अतिथि
शिक्षकों
ने
इस
शर्त
को
अपने
अध्यापन
अनुभव
पर
लागू
किए
जाने
को
चुनौती
दी।
आवेदकों के
अनुसार,
उन्होंने
दिल्ली
के
सरकारी
विद्यालयों
में
प्रशिक्षित
स्नातक
शिक्षक
(TGT)
अथवा
स्नातकोत्तर
शिक्षक
(PGT)
के
रूप
में
कई
वर्षों
तक
अध्यापन
कार्य
किया
है।
उप-प्रधानाचार्य
पद
के
लिए
निर्धारित
शैक्षणिक
योग्यताओं
के
अतिरिक्त,
पीजीटी
के
रूप
में
दो
वर्ष
अथवा
टीजीटी
के
रूप
में
तीन
वर्ष
का
अध्यापन
अनुभव
आवश्यक
था।
आवेदकों का
तर्क
था
कि
केवल
नियुक्ति
की
प्रकृति
के
आधार
पर
उनके
वास्तविक
अध्यापन
अनुभव
को
अमान्य
घोषित
करना
मनमाना
तथा
वैधानिक
भर्ती
नियमों
के
विपरीत
है।
नियमित अतिथि
शिक्षक और
विजिटिंग फैकल्टी
को एक
समान नहीं
माना जा
सकता:
आवेदकों का
तर्क
आवेदकों की
ओर
से
पेश
अधिवक्ता
अनुज
अग्रवाल
ने
दलील
दी
कि
विजिटिंग गेस्ट
फैकल्टी और
शिक्षा निदेशालय
के अंतर्गत
नियमित रूप
से अध्यापन
कार्य करने
वाले अतिथि
शिक्षकों को
स्वतः एक
ही श्रेणी
में नहीं
रखा जा
सकता।
उन्होंने तर्क
दिया
कि
विजिटिंग
फैकल्टी
सामान्यतः
आवश्यकता
के
अनुसार
व्याख्यान
देती
है
तथा
प्रति
व्याख्यान
के
आधार
पर
पारिश्रमिक
प्राप्त
करती
है।
इसके विपरीत,
शिक्षा
निदेशालय
में
कार्यरत
अतिथि
शिक्षक
निरंतर
आधार
पर
नियमित
अध्यापन
संबंधी
जिम्मेदारियां
निभाते
हैं
और
मासिक
पारिश्रमिक
प्राप्त
करते
हैं।
आवेदकों ने
कहा
कि
किसी
शिक्षक
की
पात्रता
निर्धारित
करते
समय
उसके
पदनाम
के
बजाय
उसके
द्वारा
वास्तव
में
किए
गए
कार्य,
जिम्मेदारियों
और
अर्जित
अनुभव
को
महत्व
दिया
जाना
चाहिए।
अधिवक्ता अग्रवाल
ने
यह
भी
तर्क
दिया
कि
उप-प्रधानाचार्य
पद
से
संबंधित
भर्ती
नियमों
में
अतिथि
शिक्षकों
द्वारा
प्राप्त
अध्यापन
अनुभव
को
स्पष्ट
रूप
से
अमान्य
नहीं
किया
गया
है।
उनके अनुसार,
भर्ती
विज्ञापन
के
साथ
जारी
प्रशासनिक
निर्देशों
के
माध्यम
से
वैधानिक
भर्ती
नियमों
के
दायरे
से
बाहर
जाकर
कोई
अतिरिक्त
प्रतिबंध
नहीं
लगाया
जा
सकता।
भर्ती नियमों
में शिथिलता
प्रदान करने
का भी
प्रावधान
आवेदकों ने
भर्ती
नियमों
के
नियम
5
का
भी
उल्लेख
किया,
जिसके
अंतर्गत
सरकार
निर्धारित
शर्तों
के
अधीन
और
यूपीएससी
से
परामर्श
करके
किसी
वर्ग
अथवा
श्रेणी
के
व्यक्तियों
के
संबंध
में
भर्ती
नियमों
के
प्रावधानों
में
शिथिलता
प्रदान
कर
सकती
है।
आवेदकों के
अधिवक्ता
ने
तर्क
दिया
कि
यह
प्रावधान
स्वयं
दर्शाता
है
कि
भर्ती
संबंधी
वैधानिक
व्यवस्था
उपयुक्त
परिस्थितियों
में
लचीलापन
अपनाने
की
अनुमति
देती
है।
उन्होंने कहा
कि
भर्ती
विज्ञापन
की
कठोर
व्याख्या
से
ऐसे
अनुभवी
शिक्षक
चयन
प्रक्रिया
से
बाहर
हो
सकते
हैं,
जिन्होंने
वर्षों
तक
सरकारी
विद्यालयों
में
अध्यापन
की
जिम्मेदारी
निभाई
है।
यूपीएससी ने
भर्ती शर्तों
का किया
बचाव
अंतरिम राहत
का
विरोध
करते
हुए
प्रतिवादियों
की
ओर
से
उपस्थित
अधिवक्ताओं
ने
मूल
आवेदन
की
विचारणीयता
पर
प्रारंभिक
आपत्ति
उठाई
और
भर्ती
विज्ञापन
में
निर्धारित
शर्तों
का
समर्थन
किया।
प्रतिवादियों ने
तर्क
दिया
कि
विवादित
निर्देश
केवल
स्पष्टीकरण
देने
वाले
हैं
तथा
उनका
उद्देश्य
भर्ती
नियमों
को
पूरक
बनाना
है।
उनके अनुसार,
ये
निर्देश
भर्ती
नियमों
को
निरस्त
या
परिवर्तित
नहीं
करते,
बल्कि
साक्षात्कार
के
लिए
उम्मीदवारों
की
छंटनी
के
दौरान
अनुभव
का
मूल्यांकन
किस
प्रकार
किया
जाएगा,
इसे
स्पष्ट
करते
हैं।
प्रतिवादियों ने
यह
भी
कहा
कि
विज्ञापन
में
निर्धारित
शर्तें
चयन
प्रक्रिया
में
भाग
लेने
वाले
सभी
उम्मीदवारों
पर
बाध्यकारी
हैं।
अधिकरण ने
कहा—विवादित
प्रश्नों की
विस्तृत जांच
आवश्यक
दोनों पक्षों
की
दलीलें
सुनने
के
बाद
अधिकरण
ने
कहा
कि
इस
मामले
में
मुख्य
प्रश्न
यह
है
कि
निरंतर अध्यापन
कार्य करने
और मासिक
पारिश्रमिक प्राप्त
करने वाले
अतिथि शिक्षकों
के अनुभव
को क्या
विजिटिंग गेस्ट
फैकल्टी के
अनुभव के
समान माना
जा सकता
है।
अधिकरण ने
अपने
आदेश
में
कहा:
"प्रथम
दृष्टया,
आवेदकों
के
इस
तर्क
को
कि
भर्ती
नियम
अतिथि
शिक्षकों
द्वारा
अर्जित
अनुभव
को
स्पष्ट
रूप
से
बाहर
नहीं
करते,
इस
स्तर
पर
नजरअंदाज
नहीं
किया
जा
सकता।"
हालांकि, अधिकरण
ने
यह
भी
स्पष्ट
किया
कि
प्रतिवादियों
का
यह
तर्क
कि
भर्ती
विज्ञापन
में
दिए
गए
निर्देश
केवल
स्पष्टीकरणात्मक
हैं,
विस्तृत
जांच
का
विषय
है।
पीठ ने
कहा
कि
विज्ञापन
की
विवादित
शर्तों,
वैधानिक
भर्ती
नियमों
तथा
नियम
5
में
उपलब्ध
शिथिलता
के
प्रावधानों
के
बीच
संबंध
का
विस्तृत
परीक्षण
आवश्यक
है।
अधिकरण के
अनुसार,
यह
निर्धारित
करने
के
लिए
कि
विजिटिंग गेस्ट
फैकल्टी की
अभिव्यक्ति
में
शिक्षा
निदेशालय
के
अंतर्गत
निरंतर
कार्य
करने
वाले
और
मासिक
पारिश्रमिक
प्राप्त
करने
वाले
अतिथि
शिक्षक
भी
शामिल
हैं
या
नहीं,
भर्ती
नियमों,
नियुक्ति
की
वास्तविक
प्रकृति
और
संबंधित
निर्देशों
की
सही
व्याख्या
पर
विचार
करना
होगा।
भर्ती प्रक्रिया
से बाहर
रखने पर
हो सकती
थी अपूरणीय
क्षति
अंतरिम राहत
प्रदान
करते
समय
अधिकरण
ने
इस
तथ्य
को
विशेष
महत्व
दिया
कि
आवेदन
जमा
करने
की
अंतिम
तिथि
14
अगस्त 2026 थी।
पीठ ने
माना
कि
यदि
इस
स्तर
पर
आवेदकों
को
भर्ती
प्रक्रिया
में
भाग
लेने
से
वंचित
कर
दिया
गया
और
बाद
में
वे
अपने
दावे
में
सफल
हो
गए,
तो
उन्हें
हुई
क्षति
की
पर्याप्त
भरपाई
संभव
नहीं
हो
सकती।
अधिकरण ने
कहा:
"सुविधा
का
संतुलन
इस
बात
की
मांग
करता
है
कि
आवेदकों
के
चयन
प्रक्रिया
में
भाग
लेने
के
अधिकार
को
संरक्षण
दिया
जाए,
बशर्ते
कि
यह
कार्यवाही
के
अंतिम
परिणाम
के
अधीन
रहे।"
अधिकरण ने
पाया
कि
आवेदकों
ने
सीमित
अंतरिम
संरक्षण
प्राप्त
करने
के
लिए
प्रथम
दृष्टया
मामला
स्थापित
किया
है।
इसके परिणामस्वरूप,
अधिकरण
ने
निर्देश
दिया
कि
आवेदकों
को
विज्ञापन
संख्या
51/2026
के
अंतर्गत
उप-प्रधानाचार्य
पद
की
चयन
प्रक्रिया
में
भाग
लेने
की
अनुमति
दी
जाए।
चयन परिणाम
सीलबंद लिफाफे
में रखने
का निर्देश
अंतरिम राहत
प्रदान
करते
हुए
अधिकरण
ने
स्पष्ट
किया
कि
भर्ती
प्रक्रिया
में
भाग
लेने
की
अनुमति
से
आवेदकों
को
अंतिम
चयन
अथवा
नियुक्ति
का
कोई
निहित,
न्यायसंगत
या
अपरिहार्य
अधिकार
प्राप्त
नहीं
होगा।
आवेदकों की
पात्रता
और
उम्मीदवारी
मूल
आवेदन
के
अंतिम
निर्णय
के
अधीन
रहेगी।
अधिकरण ने
यह भी
निर्देश दिया
कि आवेदकों
के परिणाम,
यदि कोई
हों, सीलबंद
लिफाफे में
रखे जाएंगे
और अधिकरण
की अनुमति
के बिना
उन्हें न
तो खोला
जाएगा और
न ही
उनके आधार
पर कोई
कार्रवाई की
जाएगी।
प्रतिवादियों को
चार
सप्ताह
के
भीतर
विस्तृत
जवाबी
हलफनामा
दाखिल
करने
का
निर्देश
दिया
गया।
इसके
बाद
आवेदकों
को
दो
सप्ताह
के
भीतर
प्रत्युत्तर
दाखिल
करने
की
अनुमति
दी
गई।
मामले को
अगली
सुनवाई
के
लिए
27
अक्टूबर 2026 को
सूचीबद्ध
किया
गया
था।
हालांकि,
12 अगस्त 2026
के
आदेश
से
यह
स्पष्ट
नहीं
होता
कि
उक्त
तारीख
को
आगे
क्या
कार्यवाही
हुई।
अतिथि शिक्षकों
के लिए
क्यों महत्वपूर्ण
है यह
मामला?
यह मामला
सरकारी
नौकरियों
में
संविदात्मक
अथवा
अतिथि
शिक्षक
के
रूप
में
प्राप्त
अध्यापन
अनुभव
को
मान्यता
देने
से
जुड़े
एक
महत्वपूर्ण
कानूनी
प्रश्न
को
सामने
लाता
है।
प्रमुख मुद्दा
यह
है
कि
जिन
शिक्षकों
ने
लंबे
समय
तक
सरकारी
विद्यालयों
में
नियमित
अध्यापन
संबंधी
जिम्मेदारियां
निभाई
हैं,
क्या
उन्हें
केवल
इस
आधार
पर
उच्च
पदों
की
भर्ती
प्रक्रिया
से
बाहर
किया
जा
सकता
है
कि
उनकी
प्रारंभिक
नियुक्ति
स्थायी
प्रकृति
की
नहीं
थी।
यह मामला
इस
प्रश्न
को
भी
उठाता
है
कि
क्या
भर्ती
प्राधिकारी
विज्ञापन
के
साथ
जारी
प्रशासनिक
निर्देशों
के
माध्यम
से
पात्रता
पर
ऐसे
प्रतिबंध
लगा
सकते
हैं,
जिनका
वैधानिक
भर्ती
नियमों
में
स्पष्ट
उल्लेख
नहीं
है।
हालांकि,
केंद्रीय प्रशासनिक
अधिकरण ने
अभी इन
कानूनी प्रश्नों
पर अंतिम
निर्णय नहीं
दिया है।
वर्तमान
अंतरिम
आदेश
का
उद्देश्य
केवल
आवेदकों
के
चयन
प्रक्रिया
में
भाग
लेने
के
अवसर
को
सुरक्षित
रखना
है।
इस विवाद
का
अंतिम
निर्णय
समान
परिस्थितियों
वाले
अन्य
अतिथि
शिक्षकों
के
लिए
भी
महत्वपूर्ण
हो
सकता
है।
हालांकि,
वर्तमान
आदेश
के
अंतर्गत
प्रदान
की
गई
अंतरिम
राहत
केवल
इस
मामले
के
नौ
आवेदकों
तक
सीमित
है।
मामले का
विवरण
मामला:
प्रज्ञा
वर्मा
एवं
अन्य
बनाम
संघ
लोक
सेवा
आयोग
एवं
अन्य
मूल आवेदन
संख्या:
ओ.ए.
2999/2026,
एम.ए.
3818/2026
सहित
न्यायिक मंच:
केंद्रीय
प्रशासनिक
अधिकरण,
प्रधान
पीठ,
नई
दिल्ली
आदेश की
तिथि:
12 अगस्त 2026
पीठ:
श्री
मनीष
गर्ग,
न्यायिक
सदस्य
एवं
डॉ.
आनंद
एस.
खाती,
प्रशासनिक
सदस्य
आवेदकों के
अधिवक्ता:
अधिवक्ता
अनुज
अग्रवाल,
उनके
साथ
अधिवक्ता
शुभम
बहल,
निखिल
पवार,
तान्या
रोज़,
शाकिब
मलिक
और
प्रदीप
कुमार।
प्रदान की
गई राहत:
आवेदकों
को
उप-प्रधानाचार्य
पद
की
यूपीएससी
भर्ती
प्रक्रिया
में
भाग
लेने
की
अंतरिम
अनुमति।
अंतिम
निर्णय
तक
उनके
परिणाम
सीलबंद
लिफाफे
में
रखे
जाएंगे।
आदेश की
प्रति:
https://www.advocateanujaggarwal.com/advocateadmin/img/Finalist/2026110117935385841.%202026%20CAT%20-%20Pragya%20Verma.pdf
कानूनी प्रतिनिधित्व
एवं संपर्क
विवरण
अनुज अग्रवाल
एंड कंपनी
अधिवक्तागण
(ANUJ
AGGARWAL & COMPANY)
कार्यालय का
पता:
के-17,
द्वितीय
तल,
जंगपुरा
एक्सटेंशन,
नई
दिल्ली
– 110014
दिल्ली उच्च
न्यायालय चैंबर:
483, ब्लॉक-II,
लॉयर्स
चैंबर्स,
दिल्ली
उच्च
न्यायालय,
नई
दिल्ली
– 110003
मोबाइल:
+91 9891403206
ईमेल:
anujaggarwal1984@gmail.com
anujaggarwalcompany@gmail.com
वेबसाइट:
https://advocateanujaggarwal.com/home.php
यह
समाचार केंद्रीय
प्रशासनिक अधिकरण
के 12
अगस्त 2026
के अंतरिम
आदेश तथा
मूल आवेदन
संख्या 2999/2026
में दाखिल
याचिका के
आधार पर
तैयार किया
गया है।
यह आदेश
आवेदकों की
अंतिम पात्रता
अथवा नियुक्ति
के अधिकार
का अंतिम
निर्धारण नहीं
करता।

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