Saturday, September 5, 2026

अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से शामिल किए जाने पर प्रतीक्षा सूची की अवधि समाप्त होना राहत से इनकार का आधार नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट

 


अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से शामिल किए जाने पर प्रतीक्षा सूची की अवधि समाप्त होना राहत से इनकार का आधार नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट

अयोग्य अभ्यर्थियों को योग्य अभ्यर्थियों के साथ प्रतिस्पर्धा में नहीं रखा जा सकता; प्रशासन अपनी चयन-प्रक्रिया की गलती को जारी रखने के लिए पैनल की अवधि समाप्त होने का सहारा नहीं ले सकता

नई दिल्ली, 13 अगस्त: सरकारी नियुक्तियों और प्रतीक्षा सूची के संचालन से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि जहाँ चयन प्रक्रिया में किसी अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से शामिल किया गया हो, वहाँ केवल इस आधार पर किसी योग्य अभ्यर्थी को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता कि प्रतीक्षा सूची की वैधता अवधि समाप्त हो चुकी है।

न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति अमित महाजन की खंडपीठ ने मोनिका मेहर द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार कर लिया। मोनिका मेहर अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग की अभ्यर्थी थीं और उन्होंने दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय में पीजीटी (इतिहास) (महिला) पद पर नियुक्ति की मांग की थी। हाई कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को परिणामी राहतें प्रदान कीं।

इस निर्णय में अदालत ने एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। सामान्यतः किसी प्रतीक्षा सूची या चयन पैनल को उसकी निर्धारित वैधता अवधि समाप्त होने के बाद संचालित नहीं किया जा सकता। लेकिन इस सिद्धांत को यांत्रिक रूप से उस स्थिति में लागू नहीं किया जा सकता, जहाँ किसी योग्य अभ्यर्थी की मेरिट अथवा प्रतीक्षा सूची में स्थिति इसलिए नीचे चली गई हो क्योंकि एक अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से चयन प्रक्रिया में शामिल होने दिया गया और उसे पैनल में स्थान दे दिया गया।

यह विवाद DSSSB द्वारा पीजीटी (इतिहास) (महिला), पोस्ट कोड 79/20 के लिए की गई भर्ती से उत्पन्न हुआ। अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए पाँच पद आरक्षित थे। मोनिका मेहर ने चयन प्रक्रिया में भाग लिया और उन्हें रिजर्व पैनल में रखा गया।

प्रारंभ में ST वर्ग के पाँच अभ्यर्थियों का चयन हुआ और अंजू मीना को याचिकाकर्ता से ऊपर प्रतीक्षा सूची में स्थान दिया गया। बाद में 18 अक्टूबर 2022 को चयनित अभ्यर्थी सविता मीना की उम्मीदवारी रद्द कर दी गई। उस समय पैनल अभी वैध था। इसके बाद रिक्त पद अंजू मीना को दिया गया और मोनिका मेहर प्रतीक्षा सूची में प्रथम स्थान पर आ गईं।

बाद में अंजू मीना की उम्मीदवारी भी रद्द कर दी गई। दस्तावेजों की जांच से यह सामने आया कि उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से एक ही समयावधि में एम.ए. (इतिहास) और बी.एड. पाठ्यक्रम किए थे, जिसके कारण उन्हें अयोग्य माना गया। इसके परिणामस्वरूप एक पद रिक्त रह गया।

DSSSB ने मोनिका मेहर के दावे का विरोध करते हुए कहा कि अंजू मीना की उम्मीदवारी रद्द होने तक एक वर्ष की पैनल अवधि समाप्त हो चुकी थी। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने इस दलील को स्वीकार करते हुए मोनिका मेहर की याचिका खारिज कर दी थी।

दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता अनुज अग्रवाल ने तर्क दिया कि मामला वास्तव में समाप्त हो चुकी प्रतीक्षा सूची को पुनः संचालित करने का नहीं था। असली मुद्दा यह था कि एक अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से एक योग्य अभ्यर्थी से ऊपर स्थान दे दिया गया था। यदि अयोग्य अभ्यर्थी को सही समय पर बाहर कर दिया गया होता, तो मोनिका मेहर प्रतीक्षा सूची में ऊपर आ जातीं और उस समय उत्पन्न रिक्ति के विरुद्ध चयनित हो जातीं, जब पैनल अभी प्रभावी था।

हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार किया।

खंडपीठ ने कहा कि यद्यपि यह सामान्य सिद्धांत स्थापित है कि किसी पैनल को उसकी वैधता अवधि से आगे संचालित नहीं किया जा सकता, लेकिन उस स्थिति में अलग सिद्धांत लागू होगा जहाँ पैनल स्वयं दोषपूर्ण हो, क्योंकि उसमें किसी अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से शामिल किया गया हो।

अदालत ने विशेष रूप से इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या केवल पैनल की अवधि समाप्त हो जाने के कारण राहत से इनकार किया जा सकता है, जबकि यदि अयोग्य अभ्यर्थी को शामिल नहीं किया गया होता तो याचिकाकर्ता चयन सूची में आ गई होती।

अपने पूर्व निर्णय State (NCT of Delhi) v. Shabana Parveen पर भरोसा करते हुए हाई कोर्ट ने दोहराया कि जहाँ किसी अभ्यर्थी की अयोग्यता चयन सूची तैयार करते समय ही पता लगाई जा सकती थी, वहाँ प्रशासन अपनी ही गलती का लाभ नहीं उठा सकता।

अदालत ने पाया कि अंजू मीना को प्रतीक्षा सूची में शामिल करना स्पष्ट रूप से गलत था और प्रतिवादी यह संतोषजनक रूप से नहीं बता सके कि आवश्यक शैक्षणिक योग्यता न होने के बावजूद उन्हें सूची में क्यों शामिल किया गया।

खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि चयन सूची तैयार करते समय यदि “सामान्य स्तर की सावधानी” भी बरती गई होती, तो अंजू मीना प्रतीक्षा सूची में शामिल नहीं होतीं और मोनिका मेहर प्रथम प्रतीक्षा सूची अभ्यर्थी होतीं।

इस फैसले का महत्व इस बात में है कि अदालत ने स्पष्ट किया कि योग्य अभ्यर्थियों को ऐसे व्यक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने या उनकी गलती का नुकसान उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो चयन प्रक्रिया की शुरुआत से ही अयोग्य थे।

प्रतीक्षा सूची की अवधि समाप्त होने को ऐसी प्रशासनिक गलती के परिणामों को बनाए रखने के लिए तकनीकी बचाव के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अदालत ने अंततः CAT के आदेश को रद्द कर दिया और रिट याचिका को परिणामी राहतों सहित स्वीकार कर लिया।

मामला: Monika Mehar v. Govt. of NCT of Delhi & Ors.
मामला संख्या: W.P.(C) 2731/2025
न्यायालय: दिल्ली हाई कोर्ट
पीठ: न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर एवं न्यायमूर्ति अमित महाजन
निर्णय की तारीख: 13 अगस्त 2026
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता: अनुज अग्रवाल एवं उनकी टीम

अनुज अग्रवाल
अधिवक्ता
K-17, द्वितीय तल, जंगपुरा एक्सटेंशन, नई दिल्ली – 110014
483, ब्लॉक-II, लॉयर्स चैंबर्स, दिल्ली हाई कोर्ट, नई दिल्ली – 110003
मोबाइल: 9891403206
ईमेल: anujaggarwal1984@gmail.com, anujaggarwalcompany@gmail.com
वेबसाइट: advocateanujaggarwal.com

EXPIRY OF WAITING PANEL NO GROUND TO DENY RELIEF WHEN INELIGIBLE CANDIDATE WAS WRONGLY INCLUDED: DELHI HIGH COURT

 


EXPIRY OF WAITING PANEL NO GROUND TO DENY RELIEF WHEN INELIGIBLE CANDIDATE WAS WRONGLY INCLUDED: DELHI HIGH COURT

INELIGIBLE CANDIDATES CANNOT BE MADE TO COMPETE WITH ELIGIBLE CANDIDATES; ADMINISTRATION CANNOT RELY ON EXPIRY OF PANEL TO PERPETUATE ITS OWN SELECTION ERROR

New Delhi, August 13: In an important ruling on public employment and operation of waiting panels, the Delhi High Court has held that the expiry of a waiting panel cannot be used to deny relief to an eligible candidate where an ineligible candidate had wrongly been included in the selection process.

A Division Bench comprising Justice C. Hari Shankar and Justice Amit Mahajan allowed the writ petition filed by Monika Mehar, an ST-category candidate seeking appointment as PGT (History) (Female) in the Directorate of Education, Government of NCT of Delhi. The Court set aside the order of the Central Administrative Tribunal and granted consequential reliefs.

The judgment lays down an important distinction: ordinarily, a waiting or selection panel cannot be operated after the expiry of its prescribed life. However, that principle cannot be mechanically applied where an eligible candidate was pushed down in the merit or waiting position because an ineligible candidate was wrongly permitted to compete and was included in the panel.

The case arose from recruitment conducted by the DSSSB for the post of PGT (History) (Female), Post Code 79/20. Five vacancies were earmarked for ST candidates. Monika Mehar participated in the selection process and was placed in the reserve panel.

Initially, five ST candidates were selected and Anju Meena was placed ahead of the petitioner in the waiting arrangement. When the candidature of one selected candidate, Savita Meena, was cancelled on October 18, 2022—while the panel was still alive—the vacancy was offered to Anju Meena. This resulted in Monika Mehar moving up to become the first wait-listed ST candidate.

Subsequently, Anju Meena’s candidature was itself cancelled after scrutiny revealed that she had simultaneously pursued an M.A. in History and a B.Ed. from the University of Rajasthan, rendering her ineligible. One vacancy thereafter remained unfilled.

The DSSSB resisted Monika Mehar’s claim on the ground that by the time Anju Meena’s candidature was cancelled, the one-year validity of the panel had already expired. The Central Administrative Tribunal accepted this contention and dismissed her case.

Before the High Court, Advocate Anuj Aggarwal, appearing for the petitioner, argued that the case was not really one of seeking operation of an expired waiting panel. The real issue was that an ineligible candidate had been wrongly allowed to occupy a position ahead of an eligible candidate. Had the ineligible candidate been excluded at the appropriate stage, the petitioner would have moved up in the waiting list and would have entered the select list when the earlier vacancy arose during the subsistence of the panel.

The High Court accepted this reasoning.

The Bench observed that although the general rule that a panel cannot ordinarily be operated beyond its life is well settled, a different principle applies where the panel itself is defective because an ineligible candidate was wrongly included in it. The Court specifically examined whether relief could be denied merely because the panel had expired when, but for the inclusion of the ineligible candidate, the petitioner would have figured in the select list.

Relying on its earlier decision in State (NCT of Delhi) v. Shabana Parveen, the Court reiterated that where the ineligibility of a candidate could have been detected at the stage of preparation of the select list, the administration cannot take advantage of its own mistake.

The Court found that the inclusion of Anju Meena was clearly illegal and that there was no satisfactory explanation as to why she had been included despite lacking the requisite educational qualification. The Bench further observed that had even “rudimentary vigilance” been exercised at the stage of preparing the list, Anju Meena would not have been included and the petitioner would have become the first wait-listed candidate.

The significance of the ruling lies in its emphasis that eligible candidates cannot be made to suffer, or effectively compete, against persons who were ineligible from the very inception of the selection process. The expiry of a waiting panel cannot be used as a technical defence to preserve the consequences of such an erroneous inclusion.

The Court accordingly set aside the CAT’s order and allowed the writ petition with consequential reliefs.

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Case: Monika Mehar v. Govt. of NCT of Delhi & Ors.

Case No.: W.P.(C) 2731/2025

Court: Delhi High Court

Bench: Justice C. Hari Shankar and Justice Amit Mahajan

Decision: August 13, 2026

Petitioner’s Counsel: Anuj Aggarwal and team.

 

Anuj Aggarwal

Advocate

 

K-17, 2nd Floor,

Jangpura Extension,

New Delhi - 110014

 

483, Block-II, Lawyers Chambers,

Delhi High Court,

New Delhi-110003

 

Mobile – 9891403206

Email – anujaggarwal1984@gmail.com, anujaggarwalcompany@gmail.com

 

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Sunday, August 16, 2026

THE ROTA-QUOTA RULE EXPLAINED IN SIMPLE LANGUAGE

 THE ROTA-QUOTA RULE EXPLAINED IN SIMPLE LANGUAGE


Who is senior — the promotee who was promoted in June, or the direct recruit selected against the same year's vacancy who joined eighteen months later?

 

Fifty years of litigation sit behind that one question. I have put together a plain-English guide to the rota-quota rule:

 

• What "quota" and "rota" actually mean, with worked illustrations

• The 1986 Office Memoranda — bunching, carry-forward and en bloc placement

• A master timeline of the law from 1959 to 2025

• The five leading judgments: N.R. Parmar (2012), its review (2013), K. Meghachandra Singh (2019), Hariharan (2022) and K.K. Soni (Delhi HC DB, 2025)

• A step-by-step decision tree for working out which rule governs a given case

 

Written for anyone who has to argue or understand inter se seniority between direct recruits and promotees.

 

Free to download and share:

https://advocateanujaggarwal.com/advocateadmin/img/Finalist/202608161786887558Complete%20Book.pdf

 

Anuj Aggarwal

Advocate

 

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Delhi High Court,

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Friday, August 14, 2026

CAT Allows Guest Teachers to Participate in Vice-Principal Recruitment; Five-Year Age Relaxation Claim Under Consideration

 



CAT Allows Guest Teachers to Participate in Vice-Principal Recruitment; Five-Year Age Relaxation Claim Under Consideration

Tribunal grants interim protection to long-serving Delhi government guest teachers challenging denial of age relaxation in UPSC recruitment

New Delhi, August 15: In a significant interim relief for long-serving Guest Teachers of Delhi government schools, the Central Administrative Tribunal (CAT), Principal Bench, has permitted them to participate in the UPSC recruitment process for 704 posts of Vice-Principal in the Directorate of Education, while their claim for age relaxation of up to five years remains under consideration.

The order was passed in Amit Shriwastava & Ors. v. Union Public Service Commission (UPSC) & Ors., in which Guest Teachers challenged the denial of age relaxation available under a Delhi Government Office Memorandum dated June 11, 2019.

The teachers contended that the 2019 policy grants contractual employees working under the Government of NCT of Delhi age relaxation of up to five years while seeking regular appointment through direct recruitment. They argued that Guest Teachers, many of whom have served the Directorate of Education for more than five years, could not be denied the benefit merely because the recruitment to the Group-A post of Vice-Principal was being conducted through UPSC.

The applicants have specifically sought a direction to UPSC to extend the benefit of up to five years’ age relaxation to Guest Teachers while considering their candidature for the Vice-Principal posts.

The Tribunal noted that the applicants were Guest Teachers who had been serving for more than five years. It also recorded their contention regarding denial of age relaxation under the June 11, 2019 Office Memorandum.

Taking note of the approaching deadline and the possibility of irreversible prejudice, the CAT held that the balance of convenience warranted interim protection. It consequently directed that the applicants be permitted to participate in the selection process for Vice-Principal under Advertisement No. 51/2026.

The Tribunal, however, clarified that participation would not create any vested right to appointment and that their candidature and eligibility would remain subject to the final outcome of the case. Their results have also been directed to be kept in a sealed cover.

The case assumes significance for long-serving Guest Teachers who may otherwise become ineligible for promotion to higher posts because of the upper-age restriction despite having spent several years teaching in Delhi government schools.

The matter will next be heard on October 27, 2026.

Advocate Anuj Aggarwal, along with Advocates Shubham Bahl, Nikhil Pawar, Shakib Malik, Tanya Rose and Pradeep Kumar, appeared for the applicants.

 

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Anuj Aggarwal

Advocate

K-17, 2nd Floor, Jangpura Extension,

New Delhi - 110014

 

483, Block-2, Lawyers Chambers,

Delhi High Court, New Delhi-110003

Mobile – 9891403206

Landline – 011 - 35554905

Email – anujaggarwal1984@gmail.com

UPSC प्रिंसिपल भर्ती में दिल्ली के गेस्ट टीचर्स को CAT से राहत; ट्रिब्यूनल ने कहा—शिक्षण अनुभव को मान्यता देने की मांग को ‘इस स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता’



 UPSC प्रिंसिपल भर्ती में दिल्ली के गेस्ट टीचर्स को CAT से राहत; ट्रिब्यूनल ने कहाशिक्षण अनुभव को मान्यता देने की मांग कोइस स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता

लं

बे समय से कार्यरत गेस्ट टीचर्स को 124 प्रिंसिपल पदों की चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति; ट्रिब्यूनल ने कहा कि उनके निरंतर शिक्षण अनुभव कोविजिटिंग गेस्ट फैकल्टीमानकर बाहर किया जा सकता है या नहीं, इस पर विस्तृत सुनवाई आवश्यक; परिणाम सीलबंद लिफाफे में रखे जाएंगे।

 

नई दिल्ली, 14 अगस्त 2026: दिल्ली सरकार के स्कूलों में लंबे समय से कार्यरत गेस्ट टीचर्स के करियर से जुड़े एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने गेस्ट टीचर्स के एक समूह को दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय में प्रिंसिपल के पद पर नियुक्ति के लिए UPSC द्वारा आयोजित चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दे दी है।

ट्रिब्यूनल ने कहा कि आवेदकों ने सीमित अंतरिम संरक्षण के लिए प्रथम दृष्टया मामला स्थापित किया है। पीठ ने यह भी कहा कि आवेदकों की यह दलील कि भर्ती नियमों में गेस्ट टीचर्स के रूप में अर्जित अनुभव को स्पष्ट रूप से बाहर नहीं किया गया है, इस स्तर पर खारिज नहीं की जा सकती।

यह आदेश 12 अगस्त 2026 को Anuja Sharma & Ors. v. Union Public Service Commission (UPSC) & Ors., O.A. No. 3000/2026 में न्यायिक सदस्य मनीष गर्ग और प्रशासनिक सदस्य डॉ. आनंद एस. खाती की पीठ ने पारित किया।

यह भर्ती UPSC Advertisement No. 51/2026 के तहत की जा रही है, जिसमें शिक्षा निदेशालय में प्रिंसिपल के 124 पद और वाइस-प्रिंसिपल के 704 पद अधिसूचित किए गए हैं। वर्तमान मामला प्रिंसिपल पद के लिए आवेदकों की पात्रता से संबंधित है।

आवेदकों की ओर से अधिवक्ता अनुज अग्रवाल के साथ अधिवक्ता शुभम बहल, शाकिब मलिक, निखिल पवार, तान्या रोज़ और प्रदीप कुमार उपस्थित हुए।

गेस्ट टीचर्स ने शिक्षण अनुभव को बाहर किए जाने को चुनौती दी

विवाद UPSC की भर्ती संबंधी एक शर्त को लेकर है, जिसके अनुसार किसी उम्मीदवार द्वारा पार्ट-टाइम आधार, दैनिक वेतन या विजिटिंग गेस्ट फैकल्टी के रूप में अर्जित अनुभव को इंटरव्यू के लिए शॉर्टलिस्टिंग हेतु वैध अनुभव की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा।

दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय के स्कूलों में कार्यरत गेस्ट टीचर्स ने तर्क दिया कि इस शर्त को लागू करके उनके वर्षों के शिक्षण अनुभव को बाहर नहीं किया जा सकता।

याचिका के अनुसार, आवेदक कई वर्षों से दिल्ली सरकार के स्कूलों में TGT, PGT अथवा लेक्चरर के रूप में कार्यरत हैं और भर्ती प्रक्रिया की अंतिम तिथि तक उनके पास 10 वर्ष से अधिक का शिक्षण अनुभव था। उनका कहना है कि वे स्वीकृत पदों के विरुद्ध लगातार शिक्षण कार्य करते रहे हैं।

ट्रिब्यूनल के आदेश में भी दर्ज है कि आवेदक पांच वर्ष से अधिक समय से गेस्ट टीचर्स के रूप में सेवाएं दे रहे हैं।

भर्ती नियमों में गेस्ट टीचर्स के अनुभव को बाहर करने का प्रावधान नहीं: आवेदक

आवेदकों की मुख्य दलील थी कि UPSC के विज्ञापन में विजिटिंग गेस्ट फैकल्टी के रूप में अर्जित अनुभव को बाहर करने की शर्त अवश्य है, लेकिन प्रिंसिपल पद के लिए लागू भर्ती नियमों में गेस्ट टीचर्स द्वारा अर्जित अनुभव को बाहर करने का कोई प्रावधान नहीं है।

यह तर्क दिया गया कि किसी विज्ञापन में दी गई प्रशासनिक शर्त वैधानिक भर्ती नियमों से आगे नहीं जा सकती और भर्ती नियमों में मौजूद होने वाली कोई अतिरिक्त अयोग्यता नहीं जोड़ सकती।

आवेदकों ने भर्ती नियमों के क्लॉज 5 का भी सहारा लिया, जिसके तहत सरकार आवश्यक या उचित समझे जाने पर, UPSC से परामर्श करके, किसी वर्ग या श्रेणी के व्यक्तियों के संबंध में नियमों के प्रावधानों में छूट दे सकती है।

उनकी ओर से कहा गया कि नियम स्वयं उचित मामलों में लचीलापन प्रदान करते हैं और केवल नियुक्ति के नाम या स्वरूप के आधार पर उनके अनुभव को पूर्ण रूप से बाहर करने का समर्थन नहीं करते।

गेस्ट टीचरको स्वतःविजिटिंग गेस्ट फैकल्टीनहीं माना जा सकता

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिक्षा निदेशालय द्वारा लगातार नियुक्त गेस्ट टीचर और केवल विजिटिंग अथवा गेस्ट फैकल्टी के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति के बीच अंतर है।

आवेदकों की ओर से दलील दी गई कि विजिटिंग फैकल्टी सामान्यतः कभी-कभार या प्रति लेक्चर के आधार पर नियुक्त हो सकती है, जबकि दिल्ली सरकार के गेस्ट टीचर्स नियमित रूप से शिक्षण कार्य करते हैं और उन्हें मासिक पारिश्रमिक दिया जाता है।

इसलिए केवल उनकी नियुक्ति का नामगेस्ट टीचरहोने के कारण उनके शिक्षण अनुभव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

याचिका में यह भी कहा गया कि आवेदक स्वीकृत शिक्षण पदों के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं और उनकी तुलना केवल आकस्मिक, अस्थायी या जरूरत के आधार पर नियुक्त व्यक्तियों से नहीं की जा सकती।

CAT ने कहाआवेदकों की दलील कोइस स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता

दोनों पक्षों को सुनने के बाद ट्रिब्यूनल ने मुख्य प्रश्न की पहचान कीक्या लगातार कार्य करने वाले और मासिक पारिश्रमिक प्राप्त करने वाले गेस्ट टीचर्स का अनुभव UPSC विज्ञापन में उल्लिखितविजिटिंग गेस्ट फैकल्टीके अनुभव के समान माना जा सकता है?

पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

प्रथम दृष्टया, आवेदकों की यह दलील कि भर्ती नियमों में गेस्ट टीचर्स द्वारा अर्जित अनुभव को स्पष्ट रूप से बाहर नहीं किया गया है, इस स्तर पर खारिज नहीं की जा सकती।

हालांकि, ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि उसने अभी इस विवाद पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। उसने प्रतिवादियों की इस दलील को भी विचार योग्य माना कि विज्ञापन में दी गई शर्तें केवल स्पष्टीकरणात्मक हैं और उन्हें भर्ती नियमों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि विज्ञापन की शर्तों और भर्ती नियमों, विशेष रूप से क्लॉज 5, के बीच संबंध पर प्रतिवादियों का जवाब हलफनामे पर आने के बाद विस्तार से विचार किया जाएगा।

क्या लगातार कार्यरत गेस्ट टीचर्सविजिटिंग गेस्ट फैकल्टीके दायरे में आते हैंइस पर फैसला बाकी

ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि उसे यह तय करना होगा कि विजिटिंग गेस्ट फैकल्टी शब्द का दायरा इतना व्यापक है या नहीं कि उसमें शिक्षा निदेशालय द्वारा लगातार नियुक्त और मासिक पारिश्रमिक प्राप्त करने वाले गेस्ट टीचर्स भी शामिल हो जाएं।

पीठ के अनुसार, इसका उत्तर भर्ती नियमों की योजना, आवेदकों की नियुक्ति की वास्तविक प्रकृति तथा विवादित भर्ती निर्देश के सही अर्थ और दायरे पर निर्भर करेगा।

इस टिप्पणी का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इससे यह बड़ा कानूनी प्रश्न खुला रहता है कि केवलगेस्टशब्द समान होने के आधार पर लंबे समय से कार्यरत गेस्ट टीचर्स को कभी-कभार कार्य करने वाली विजिटिंग फैकल्टी के समान माना जा सकता है या नहीं।

UPSC ने अंतरिम राहत का विरोध किया

UPSC ने अंतरिम राहत का विरोध करते हुए मूल आवेदन की विचारणीयता पर भी प्रारंभिक आपत्ति उठाई।

प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि विज्ञापन में दी गई शर्तें केवल स्पष्टीकरणात्मक और स्पष्टकारी हैं तथा उन्हें भर्ती नियमों के साथ सामंजस्यपूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए।

उनका यह भी कहना था कि भर्ती विज्ञापन का हिस्सा होने के कारण ये निर्देश उम्मीदवारों पर बाध्यकारी हैं और केवल यह स्पष्ट करते हैं कि शॉर्टलिस्टिंग के लिए आवश्यक अनुभव की गणना किस प्रकार की जाएगी।

ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को अभी तो स्वीकार किया और ही खारिज किया। उसने कहा कि प्रतिवादियों के विस्तृत जवाब के बाद इस मुद्दे पर विचार किया जाएगा।

आवेदन की अंतिम तिथि के कारण अंतरिम संरक्षण

ट्रिब्यूनल के समक्ष एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी था कि आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 14 अगस्त 2026 थी।

आवेदकों का तर्क था कि यदि उन्हें अभी चयन प्रक्रिया में भाग लेने से रोक दिया गया और बाद में वे मुकदमे में सफल हो गए, तो इस दौरान खोए अवसर की प्रभावी रूप से भरपाई नहीं की जा सकेगी।

CAT ने इस चिंता में दम पाया और कहा कि यदि अभी भाग लेने से रोक दिया गया तथा आवेदक बाद में सफल होते हैं, तो उन्हें होने वाली क्षति ऐसी हो सकती है जिसकी पर्याप्त भरपाई संभव हो।

इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने माना कि सुविधा का संतुलन आवेदकों को चयन प्रक्रिया में भाग लेने के अधिकार की अंतरिम सुरक्षा देने के पक्ष में है, बशर्ते उनका अधिकार मामले के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा।

गेस्ट टीचर्स को प्रिंसिपल चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति

अंतरिम राहत देते हुए CAT ने निर्देश दिया:

आवेदकों को Advertisement No. 51/2026 के तहत प्रिंसिपल पद की चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दी जाएगी।

यह निर्देश दोनों पक्षों के अधिकारों और दलीलों को प्रभावित किए बिना दिया गया है।

मूल आवेदन में विशेष रूप से यह राहत मांगी गई थी कि आवेदकों के आवेदन अस्थायी रूप से स्वीकार किए जाएं और उन्हें UPSC द्वारा 1 नवंबर 2026 को निर्धारित परीक्षा सहित पूरी भर्ती प्रक्रिया में भाग लेने दिया जाए।

नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं; परिणाम सीलबंद लिफाफे में रहेंगे

ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि अंतरिम आदेश के तहत चयन प्रक्रिया में भाग लेने से आवेदकों को नियुक्ति या अंतिम चयन का कोई निहित, न्यायसंगत अथवा अपरिहार्य अधिकार प्राप्त नहीं होगा।

उनकी उम्मीदवारी और पात्रता मूल आवेदन के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी।

इसके अतिरिक्त CAT ने निर्देश दिया कि आवेदकों के परिणाम, यदि कोई हों, सीलबंद लिफाफे में रखे जाएं और ट्रिब्यूनल की अनुमति के बिना उन्हें खोला जाए और उन पर कोई कार्रवाई की जाए।

इस प्रकार आदेश ने एक ओर आवेदकों के चयन प्रक्रिया में भाग लेने के अवसर को सुरक्षित रखा है, वहीं दूसरी ओर पात्रता विवाद का अंतिम फैसला होने से पहले किसी प्रकार का अंतिम अधिकार उत्पन्न होने से भी रोका है।

आवेदकों का दावादिल्ली सरकार ने स्वयं गेस्ट टीचर्स के अनुभव को मान्यता दी है

मूल आवेदन में कई तथ्यों का उल्लेख करते हुए यह दावा किया गया है कि दिल्ली सरकार ने स्वयं गेस्ट टीचर्स के अनुभव को मान्यता दी है।

याचिका के अनुसार, सरकार के 11 जून 2019 के ऑफिस मेमोरेंडम में यह प्रावधान है कि यदि किसी गेस्ट टीचर ने किसी शैक्षणिक वर्ष में कम से कम 120 दिन कार्य किया है, तो उसे एक वर्ष का शिक्षण अनुभव माना जाएगा।

याचिका में शिक्षा निदेशालय द्वारा 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल उस हलफनामे का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें यह स्वीकार किया गया था कि गेस्ट टीचर्स स्वीकृत शिक्षण पदों के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं।

आवेदकों ने यह भी कहा कि शिक्षा निदेशालय ने स्वयं उन्हें उच्च शिक्षण एवं प्रशासनिक पदों की भर्ती में भाग लेने के लिए अनुभव प्रमाणपत्र जारी किए हैं, जो उनके अनुसार गेस्ट टीचर के रूप में अर्जित शिक्षण अनुभव की सरकारी मान्यता को दर्शाता है।

हालांकि, इन दलीलों पर ट्रिब्यूनल का अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है।

लंबे समय से कार्यरत गेस्ट टीचर्स के लिए मामले के व्यापक प्रभाव हो सकते हैं

यह मामला उन गेस्ट टीचर्स को प्रभावित करने वाला एक बड़ा प्रश्न उठाता है जो वर्षों से सरकारी स्कूलों में कार्यरत हैंक्या वास्तविक और महत्वपूर्ण शिक्षण अनुभव को केवल इसलिए नजरअंदाज किया जा सकता है क्योंकि शिक्षक की नियुक्ति कोगेस्टकहा गया है?

आवेदकों का कहना है कि स्वीकृत पदों पर नियमित शिक्षण कार्य करते हुए अर्जित निरंतर अनुभव की तुलना विजिटिंग फैकल्टी की अंतराल पर, आकस्मिक अथवा प्रति लेक्चर नियुक्ति से नहीं की जा सकती।

अंतिम निर्णय का प्रभाव वर्तमान आवेदकों से आगे भी जा सकता है, विशेष रूप से उन लंबे समय से कार्यरत गेस्ट टीचर्स पर जो ऐसे वरिष्ठ शैक्षणिक और प्रशासनिक पदों पर पदोन्नति या सीधी भर्ती चाहते हैं, जिनके भर्ती नियम न्यूनतम शिक्षण अनुभव तो निर्धारित करते हैं लेकिन उसे केवल नियमित या स्थायी सेवा तक सीमित नहीं करते।

फिलहाल CAT ने केवल सीमित अंतरिम संरक्षण दिया है। ट्रिब्यूनल ने तो अंतिम रूप से यह घोषित किया है कि गेस्ट टीचर का अनुभव प्रिंसिपल पद के लिए मान्य अनुभव है और ही UPSC की विवादित शर्त को अंतिम रूप से अवैध ठहराया है।

प्रतिवादियों को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश

ट्रिब्यूनल ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर विस्तृत काउंटर-अफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद आवेदकों को दो सप्ताह के भीतर रिजॉइंडर दाखिल करने की अनुमति दी गई है।

दोनों पक्षों को अंतरिम आदेश में बदलाव, संशोधन, स्पष्टीकरण अथवा उसे निरस्त कराने के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता भी दी गई है।

मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को होगी।

मामला: Anuja Sharma & Ors. v. Union Public Service Commission (UPSC) & Ors.


मामला संख्या: O.A. No. 3000/2026


न्यायालय: केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, प्रधान पीठ, नई दिल्ली


पीठ: मनीष गर्ग, सदस्य (न्यायिक) एवं डॉ. आनंद एस. खाती, सदस्य (प्रशासनिक)


आदेश की तारीख: 12 अगस्त 2026


संबंधित पद: प्रिंसिपल, शिक्षा निदेशालय, GNCTD


विज्ञापन: UPSC Advertisement No. 51/2026


प्रिंसिपल के पद: 124


अगली सुनवाई: 27 अक्टूबर 2026

 

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https://judgmentslaw.blogspot.com/2026/08/cat-relief-for-delhi-guest-teachers-in.html

 

 

 

अनुज अग्रवाल


अधिवक्ता
K-17,
द्वितीय तल, जंगपुरा एक्सटेंशन,

नई दिल्ली110014

483, ब्लॉक-2, लॉयर्स चैंबर्स,

दिल्ली हाई कोर्ट, नई दिल्ली110003

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