कैट ने दिल्ली जल बोर्ड के जूनियर इंजीनियर की बर्खास्तगी रद्द की; जांच अधिकारी के विरुद्ध पक्षपात की शिकायत की अनदेखी, भेदभावपूर्ण दंड और अपील पर बिना विचार किए आदेश पारित करने को गलत ठहराया
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने कहा—जांच अधिकारी के विरुद्ध पक्षपात की शिकायत पर निर्णय लिए बिना विभागीय जांच जारी नहीं रखी जानी चाहिए थी;
कर्मचारी को सभी नियमानुसार परिणामी लाभ देने का आदेश।
नई दिल्ली, 1 नवंबर
2026।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) की प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने दिल्ली जल बोर्ड के एक पूर्व जूनियर इंजीनियर की सेवा से बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। अधिकरण ने विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही में गंभीर प्रक्रियागत खामियां पाईं। इनमें सबसे प्रमुख खामी यह थी कि कर्मचारी द्वारा जांच अधिकारी के विरुद्ध पक्षपात की शिकायत किए जाने के बावजूद उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया और विभागीय जांच जारी रखी गई।
न्यायिक सदस्य माननीय श्री आर. एन. सिंह और प्रशासनिक सदस्य माननीय श्री बी. आनंद की पीठ ने 17 अगस्त 2026 को पारित अपने निर्णय में दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व जूनियर इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल एवं मैकेनिकल) श्री महेश कुमार द्वारा दायर मूल आवेदन संख्या 734/2016 को स्वीकार कर लिया।
आवेदक की ओर से अधिवक्ता श्री शुभम बहल ने अधिकरण के समक्ष उपस्थित होकर मामले में प्रभावी पैरवी की।
अधिकरण ने 7 अक्टूबर
2015 को पारित अपीलीय आदेश तथा अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा सेवा से बर्खास्त करने के आदेश,
दोनों को रद्द कर दिया।
अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि श्री महेश कुमार संबंधित नियमों के अनुसार सभी परिणामी सेवा लाभ प्राप्त करने के हकदार होंगे। दिल्ली जल बोर्ड को निर्देश दिया गया कि वह आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के बाद यथाशीघ्र,
और अधिमानतः छह सप्ताह के भीतर,
अधिकरण के निर्देशों का पालन करे।
जांच अधिकारी के विरुद्ध पक्षपात की शिकायत की अनदेखी
श्री महेश कुमार के विरुद्ध वर्ष
2013 में इस आरोप पर विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी कि उन्होंने अपनी नियुक्ति के समय कथित रूप से फर्जी डिप्लोमा प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था।
विभागीय जांच के दौरान श्री महेश कुमार ने बार-बार शिकायत की कि जांच अधिकारी एकतरफा और पक्षपातपूर्ण ढंग से कार्यवाही कर रहे हैं। उन्होंने निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए वर्तमान जांच अधिकारी को बदलकर किसी अन्य अधिकारी को नियुक्त करने का अनुरोध किया।
इसके बावजूद न तो जांच अधिकारी और न ही अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने उनकी शिकायत पर कोई निर्णय लिया। उनकी आपत्ति का निस्तारण किए बिना ही विभागीय जांच पूरी कर दी गई।
अधिकरण ने पाया कि यह कार्यवाही कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग
(DoPT) के 9 नवंबर 1972 के कार्यालय ज्ञापन के विपरीत थी।
इस कार्यालय ज्ञापन के अनुसार, यदि कोई सरकारी कर्मचारी जांच अधिकारी के विरुद्ध पक्षपात की शिकायत करता है, तो विभागीय जांच की कार्यवाही रोककर शिकायत को संबंधित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष निर्णय के लिए भेजा जाना चाहिए।
अधिकरण ने स्पष्ट किया कि श्री महेश कुमार द्वारा जांच अधिकारी के विरुद्ध बार-बार आपत्ति उठाए जाने के तथ्य का खंडन नहीं किया गया था।
इसके बावजूद उनकी शिकायत पर विचार किए बिना विभागीय जांच जारी रखना
DoPT के लागू निर्देशों का उल्लंघन था।
समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को अलग-अलग दंड देना भेदभावपूर्ण
अधिकरण ने श्री महेश कुमार की इस दलील को भी स्वीकार किया कि दिल्ली जल बोर्ड ने समान प्रकार के आरोपों का सामना कर रहे दो कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया।
श्री महेश कुमार ने बताया कि एक अन्य कर्मचारी,
श्री जसवीर सिंह, के विरुद्ध भी इसी प्रकार के आरोप थे। हालांकि,
उन्हें सेवा से बर्खास्त करने के बजाय अनिवार्य सेवानिवृत्ति का अपेक्षाकृत कम कठोर दंड दिया गया।
इसके विपरीत श्री महेश कुमार को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
अधिकरण ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी लिमिटेड बनाम जितेंद्र प्रसाद सिंह एवं अन्य का उल्लेख करते हुए कहा कि समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ दंड के मामले में भेदभावपूर्ण व्यवहार करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, अर्थात कानून के समक्ष समानता के अधिकार, का उल्लंघन है।
अधिकरण ने माना कि समान परिस्थितियों में कर्मचारियों के साथ मनमाना और असमान व्यवहार न्यायसंगत नहीं है।
अपीलीय आदेश में विवेक का प्रयोग नहीं; बिना ठोस कारण बताए अपील खारिज की गई
अधिकरण ने दिल्ली जल बोर्ड के अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश में भी गंभीर कानूनी खामियां पाईं।
श्री महेश कुमार ने अपनी वैधानिक अपील में जांच अधिकारी के कथित पक्षपात, विभागीय जांच में हुई अनियमितताओं तथा समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को अलग-अलग दंड दिए जाने सहित कई महत्वपूर्ण आधार उठाए थे।
लेकिन अपीलीय प्राधिकारी ने इन महत्वपूर्ण आपत्तियों पर विचार किए बिना उनकी अपील खारिज कर दी।
अधिकरण ने पाया कि अपीलीय आदेश में विवेक का प्रयोग न किए जाने (Non-application of Mind) तथा यांत्रिक ढंग से निर्णय लेने की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
अधिकरण ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय महाबीर प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का उल्लेख करते हुए दोहराया कि अर्ध-न्यायिक प्राधिकारियों के लिए अपने निर्णयों के समर्थन में स्पष्ट और ठोस कारण देना अनिवार्य है।
केवल औपचारिक रूप से अपील खारिज कर देना पर्याप्त नहीं है। अपीलीय प्राधिकारी का यह दायित्व है कि वह अपील में उठाए गए महत्वपूर्ण कानूनी और तथ्यात्मक आधारों पर विचार करके कारणयुक्त आदेश पारित करे।
12 वर्ष से अधिक समय बीतने के कारण मामले को दोबारा विभागीय जांच के लिए भेजने से इनकार
अधिकरण ने अपने निर्णय में कहा कि सामान्य परिस्थितियों में विभागीय जांच में प्रक्रियागत त्रुटि पाए जाने पर मामले को उस चरण से पुनः शुरू करने के लिए संबंधित विभाग के पास भेजा जा सकता है,
जहां त्रुटि हुई थी।
हालांकि, वर्तमान मामले में अधिकरण ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
अधिकरण ने इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिया कि श्री महेश कुमार
31 जुलाई
2014 को ही सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त कर चुके थे और उसके बाद
12 वर्ष से अधिक समय बीत चुका था।
इन परिस्थितियों में अधिकरण ने माना कि विवाद को अब अंतिम रूप से समाप्त किया जाना आवश्यक है।
पीठ ने कहा कि इस मामले को अब “Put to a Quietus” अर्थात विवाद का अंतिम निस्तारण किया जाना चाहिए।
अधिकरण ने यह भी उल्लेख किया कि दिल्ली जल बोर्ड चाहे तो श्री महेश कुमार के मामले में भी वही व्यवहार कर सकता है,
जो समान आरोपों का सामना करने वाले कर्मचारी श्री जसवीर सिंह के साथ किया गया था।
अंततः अधिकरण ने श्री महेश कुमार की बर्खास्तगी तथा उनकी विभागीय अपील को खारिज करने वाले आदेशों को रद्द कर दिया।
अधिकरण ने यह भी आदेश दिया कि श्री महेश कुमार को संबंधित नियमों एवं निर्देशों के अनुसार सभी परिणामी सेवा लाभ प्रदान किए जाएं।
दिल्ली जल बोर्ड को निर्देश दिया गया कि वह अधिकरण के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के बाद यथाशीघ्र,
अधिमानतः छह सप्ताह के भीतर, इन निर्देशों का पालन करे।
पूरा निर्णय पढ़ें
मामला: श्री महेश कुमार बनाम दिल्ली जल बोर्ड
मूल आवेदन संख्या: 734/2016
निर्णय की तारीख: 17 अगस्त
2026
न्यायपीठ: माननीय श्री आर. एन. सिंह, न्यायिक सदस्य एवं माननीय श्री बी. आनंद,
प्रशासनिक सदस्य
आवेदक के अधिवक्ता: श्री शुभम बहल
पूरा न्यायिक निर्णय
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संपर्क करें
अनुज अग्रवाल (Anuj Aggarwal)
अधिवक्ता
कार्यालय 1:
के-17,
द्वितीय तल,
जंगपुरा एक्सटेंशन,
नई दिल्ली – 110014
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483, ब्लॉक-II, लॉयर्स चैंबर्स,
दिल्ली उच्च न्यायालय,
नई दिल्ली – 110003
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