दिल्ली उच्च न्यायालय ने ओबीसी उम्मीदवार के अधिकारों को बरकरार रखा; शिक्षक भर्ती मामले में डीएसएसएसबी की रिट याचिका खारिज
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नई दिल्ली, 2 सितंबर
2026: सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लाभ से संबंधित एक महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) द्वारा लाल चंद के विरुद्ध दायर रिट याचिका खारिज कर दी है। लाल चंद दिल्ली सरकार के विद्यालयों में प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (सामाजिक विज्ञान) के पद पर नियुक्ति के अभ्यर्थी हैं।
न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति विनोद कुमार की खंडपीठ ने उम्मीदवार के पक्ष में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण
(CAT) के निर्णय को बरकरार रखते हुए संबंधित अधिकारियों को आठ सप्ताह के भीतर उसका परीक्षा परिणाम घोषित करने और उसके अनुसार आगे की आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड एवं अन्य बनाम लाल चंद, W.P.(C) संख्या 6450/2025 में सुनाया गया यह निर्णय अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उन उम्मीदवारों की पात्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर प्रकाश डालता है,
जिनके जाति प्रमाणपत्र प्रारंभ में किसी अन्य राज्य में जारी पारिवारिक दस्तावेजों के आधार पर बनाए गए थे और बाद में दिल्ली के सक्षम अधिकारियों द्वारा उनमें सुधार किया गया।
न्यायालय ने दिल्ली सरकार के
31 मई
2021 के कार्यालय ज्ञापन के प्रभाव की जांच की। यह ज्ञापन उन भर्ती शर्तों से संबंधित है, जिनके अंतर्गत ओबीसी प्रमाणपत्र किसी निकट पारिवारिक सदस्य के पुराने जाति प्रमाणपत्र के आधार पर जारी होना आवश्यक माना जाता था।
ओबीसी कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करने के बावजूद उम्मीदवार की अभ्यर्थिता खारिज
यह विवाद मई
2021 में डीएसएसएसबी द्वारा प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (सामाजिक विज्ञान),
पुरुष,
पद कोड 39/21 के लिए जारी भर्ती विज्ञापन से उत्पन्न हुआ।
इस भर्ती में कुल 469 रिक्त पद थे,
जिनमें से 116 पद ओबीसी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थे।
तेली समुदाय से संबंधित लाल चंद ने 12 जनवरी
2016 को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार से अपना पहला ओबीसी प्रमाणपत्र प्राप्त किया था। यह प्रमाणपत्र उनके पिता के नाम उत्तर प्रदेश में जारी किए गए पुराने जाति प्रमाणपत्र के आधार पर बनाया गया था।
मामले के घटनाक्रम के अनुसार, लाल चंद ने भर्ती परीक्षा में 200 में से 112.08 अंक प्राप्त किए थे, जबकि ओबीसी श्रेणी में अंतिम अस्थायी रूप से चयनित उम्मीदवार के अंक केवल 95.91 थे।
इसके बावजूद, डीएसएसएसबी ने 28 अप्रैल 2022 को लाल चंद की अभ्यर्थिता खारिज कर दी।
बोर्ड का कहना था कि उनके पहले ओबीसी प्रमाणपत्र में संबंधित समुदाय को उत्तर प्रदेश में मान्यता प्राप्त बताया गया था। इसके अतिरिक्त, दिल्ली का संशोधित ओबीसी प्रमाणपत्र 7 फरवरी 2022 को जारी हुआ था,
अर्थात भर्ती की अंतिम तिथि के बाद।
लाल चंद का पक्ष था कि वह ऐसे समुदाय से संबंधित हैं जिसे दिल्ली में भी ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत मान्यता प्राप्त है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि डीएसएसएसबी द्वारा दस्तावेजों की कमियां दूर करने का अवसर दिए जाने के बाद उन्होंने दिल्ली के सक्षम अधिकारियों से संशोधित प्रमाणपत्र प्राप्त किया था।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने उम्मीदवार को राहत दी
अपनी अभ्यर्थिता खारिज किए जाने से व्यथित होकर लाल चंद ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, प्रधान पीठ, नई दिल्ली के समक्ष मूल आवेदन संख्या 1669/2022 दायर किया।
5 जुलाई 2024 को अधिकरण ने उनका मूल आवेदन स्वीकार कर लिया।
इसके बाद डीएसएसएसबी और एक अन्य प्राधिकारी ने अधिकरण के निर्णय को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में
W.P.(C) संख्या 6450/2025 दायर की।
उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या दिल्ली सरकार द्वारा बाद में जारी किए गए नीतिगत स्पष्टीकरण के बावजूद भर्ती प्राधिकारी ओबीसी प्रमाणपत्र के लिए निकट पारिवारिक सदस्य के पुराने जाति प्रमाणपत्र की शर्त पर जोर दे सकते हैं।
दिल्ली सरकार का वर्ष
2021 का स्पष्टीकरण निर्णायक साबित हुआ
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण आधार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के सेवा विभाग द्वारा 31 मई 2021 को जारी कार्यालय ज्ञापन था।
इस कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट किया गया था कि यदि किसी उम्मीदवार के पास दिल्ली के राजस्व विभाग द्वारा जारी ओबीसी
(दिल्ली) प्रमाणपत्र है, जिसमें यह प्रमाणित किया गया है कि वह दिल्ली में अधिसूचित ओबीसी समुदाय से संबंधित है, तो वह आरक्षण का लाभ प्राप्त करने का पात्र होगा।
ऐसे उम्मीदवार को आरक्षण के लाभ से केवल इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके प्रमाणपत्र में पिता, भाई-बहन अथवा पैतृक चाचा के नाम पहले से जारी किसी पुराने जाति प्रमाणपत्र का उल्लेख नहीं है।
खंडपीठ ने लाल चंद के 7 फरवरी
2022 के प्रमाणपत्र की वैधता पर विचार करते हुए इस स्पष्टीकरण का परीक्षण किया।
न्यायालय ने भर्ती अधिकारियों की उस आपत्ति को अस्वीकार कर दिया कि प्रमाणपत्र केवल इसलिए दोषपूर्ण है क्योंकि उसमें भर्ती विज्ञापन के अनुसार किसी निकट पारिवारिक सदस्य के पुराने प्रमाणपत्र का आधार स्थापित नहीं किया गया था।
अपने निर्णय के पैराग्राफ 47 और 48 में न्यायालय ने माना कि 31 मई 2021 के कार्यालय ज्ञापन के बाद किसी निकट संबंधी के पुराने प्रमाणपत्र के आधार पर ही नया प्रमाणपत्र जारी होने की शर्त पर जोर नहीं दिया जा सकता।
खंडपीठ ने कहा:
"31 मई 2021 के कार्यालय ज्ञापन के मद्देनजर, प्रत्यर्थी के किसी निकट संबंधी के नाम जारी पुराने प्रमाणपत्र के आधार पर ही उसका प्रमाणपत्र जारी होने की आवश्यकता समाप्त मानी जाएगी।"
न्यायालय ने इस कार्यालय ज्ञापन को स्पष्टीकरणात्मक प्रकृति का भी माना,
जिसे पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू किया जा सकता है।
संबंधित मामलों में इस निष्कर्ष के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के निर्णय Sree Sankaracharya University of Sanskrit v. Manu,
(2023) 19 SCC 30 का भी उल्लेख किया गया।
उच्च न्यायालय ने डीएसएसएसबी की चुनौती खारिज की
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई उचित आधार न पाते हुए खंडपीठ ने डीएसएसएसबी की रिट याचिका खारिज कर दी।
निर्णय के पैराग्राफ
49 से
51 में न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला:
"अतः हमें यह ऐसा मामला नहीं लगता जिसमें अधिकरण द्वारा पारित चुनौती दिए गए आदेश में हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।"
न्यायालय ने आगे निर्देश दिया:
"प्रत्यर्थी का परीक्षा परिणाम घोषित किया जाए तथा आज से आठ सप्ताह के भीतर उसके अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए।"
इस निर्णय के परिणामस्वरूप केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण द्वारा लाल चंद को प्रदान की गई राहत बरकरार रही और संबंधित अधिकारियों को न्यायालय के आदेश के अनुसार आगे की कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया।
यह उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह नहीं कहा कि लाल चंद की नियुक्ति पहले ही हो चुकी है। न्यायालय का निर्देश निर्धारित समय-सीमा के भीतर परीक्षा परिणाम घोषित करने और उसके आधार पर आवश्यक कार्रवाई करने से संबंधित है।
सरकारी नौकरी के अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण निर्णय
यह फैसला राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के अंतर्गत विभिन्न सरकारी पदों पर भर्ती में ओबीसी आरक्षण का लाभ प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण है।
यह निर्णय 31 मई 2021 के दिल्ली सरकार के स्पष्टीकरण के कानूनी महत्व को पुष्ट करता है।
इसके अनुसार, केवल इस आधार पर ओबीसी (दिल्ली) प्रमाणपत्र अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसमें परिवार के किसी निकट सदस्य के नाम जारी पुराने जाति प्रमाणपत्र का उल्लेख नहीं है।
यह फैसला विशेष रूप से उन उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके पास दिल्ली के सक्षम अधिकारियों द्वारा जारी वैध प्रमाणपत्र हैं, लेकिन उनके परिवार के पुराने जाति संबंधी दस्तावेज किसी अन्य राज्य से संबंधित होने के कारण उनकी पात्रता पर आपत्ति उठाई जाती है।
हालांकि, इस निर्णय का यह अर्थ नहीं है कि ओबीसी आरक्षण से संबंधित सभी पात्रता शर्तें समाप्त हो गई हैं अथवा भर्ती की अंतिम तिथि के बाद जारी किए गए सभी प्रमाणपत्र स्वतः स्वीकार किए जाने चाहिए।
न्यायालय का निर्णय दिल्ली सरकार के लागू स्पष्टीकरण और उसके समक्ष प्रस्तुत मामलों की विशिष्ट परिस्थितियों पर आधारित है।
यह फैसला ओबीसी आरक्षण और जाति प्रमाणपत्रों से संबंधित भर्ती विवादों की अनेक परस्पर संबद्ध याचिकाओं के साथ सुनाया गया।
लाल चंद की ओर से उपस्थित अधिवक्ता
दिल्ली उच्च न्यायालय में लाल चंद का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता अनुज अग्रवाल ने अधिवक्ताओं की एक टीम के साथ किया।
न्यायालय के निर्णय में दर्ज उपस्थिति के अनुसार, लाल चंद की ओर से निम्नलिखित अधिवक्ता उपस्थित थे:
श्री अनुज अग्रवाल,
श्री निखिल पवार, श्री शुभम बहल, सुश्री कृतिका मट्टा, सुश्री तान्या रोज़, सुश्री भूमिका कुंद्रा, श्री प्रदीप कुमार, श्री लवकेश, सुश्री अंजलि बंसल,
श्री मानस वर्मा और श्री शाकिब मलिक।
यह निर्णय 2 सितंबर
2026 को न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति विनोद कुमार की खंडपीठ द्वारा सुनाया गया।
मामले का विवरण:
Delhi Subordinate Services Selection Board and Another v.
Lal Chand
- मामला संख्या: W.P.(C) 6450/2025
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, खंडपीठ
- निर्णय की तिथि:
2 सितंबर 2026
- संबंधित पैराग्राफ: 41–51
पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए:
दिल्ली उच्च न्यायालय का संपूर्ण निर्णय
(PDF)
विस्तृत कानूनी समाचार:
Judgments
Law – समाचार एवं विश्लेषण
अनुज अग्रवाल एंड कंपनी
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