बड़ी कानूनी जीत: 13 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद दिल्ली की अदालत ने आपराधिक मानहानि के मामले में स्कूल शिक्षिका को किया बरी
अदालत ने कहा—केवल आरोपों, संदेह और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर आपराधिक मानहानि का अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता। कथित मानहानिकारक शब्दों का स्पष्ट उल्लेख न होना और स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी गवाहों का अभाव शिकायतकर्ता के मामले के लिए घातक साबित हुआ।
नई दिल्ली | 31 अक्टूबर 2026
एक स्कूल शिक्षिका
को बड़ी कानूनी
राहत देते हुए
दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने सुश्री भारती शर्मा को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 500 के अंतर्गत आपराधिक मानहानि के आरोपों से बरी कर दिया है। इस
फैसले के साथ
ही 13 वर्ष से
अधिक समय से
चल रहे आपराधिक
मुकदमे का अंत
हो गया।
यह महत्वपूर्ण फैसला
28 सितंबर 2026 को
श्री कार्तिक तपारिया, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी–06, मध्य जिला, तीस हजारी न्यायालय, दिल्ली द्वारा
एस.के. सक्सेना बनाम भारती शर्मा, शिकायत
वाद संख्या 515362/2016 में सुनाया गया।
अधिवक्ता अनुज अग्रवाल ने आरोपी शिक्षिका की ओर से मुकदमे की पैरवी की और आपराधिक मानहानि के आरोपों का सफलतापूर्वक खंडन किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद दिल्ली
स्थित रुक्मणी देवी
जयपुरिया पब्लिक
स्कूल की प्राथमिक
शिक्षिका सुश्री
भारती शर्मा और
विद्यालय के
तत्कालीन प्रधानाचार्य
श्री एस.के.
सक्सेना के
बीच उत्पन्न हुआ
था।
शिकायतकर्ता का
आरोप था कि
शिक्षिका ने
विद्यालय की
अनुशासनात्मक कार्यवाही
के दौरान उनके
तथा उनकी पत्नी
के विरुद्ध अपमानजनक
टिप्पणियां की
थीं, उन्हें झूठे
मुकदमों में
फंसाने की धमकी
दी थी तथा
विद्यार्थियों या
अन्य व्यक्तियों को
कक्षाओं की
दीवारों पर
उनके विरुद्ध अपमानजनक
नारे लिखने के
लिए उकसाया था।
इन आरोपों के
आधार पर 25 मार्च 2013 को
भारतीय दंड संहिता
की धारा 500 के
अंतर्गत आपराधिक
मानहानि की
शिकायत दायर की
गई थी।
आरोपी शिक्षिका ने
सभी आरोपों से
इनकार किया और
न्यायालय में
मुकदमे का सामना
किया।
बचाव पक्ष की ओर से प्रस्तुत दलीलें
आरोपी शिक्षिका की
ओर से पैरवी
करते हुए अधिवक्ता अनुज अग्रवाल ने
शिकायतकर्ता के
आरोपों को कई
महत्वपूर्ण आधारों
पर चुनौती दी।
उन्होंने तर्क
दिया कि शिकायतकर्ता
उन सटीक शब्दों
का उल्लेख करने
में असफल रहा,
जो कथित रूप
से शिक्षिका ने
कहे थे और
जिनसे उसकी मानहानि
हुई थी।
उन्होंने यह
भी दलील दी
कि शिकायतकर्ता ने
ऐसा कोई स्वतंत्र
प्रत्यक्षदर्शी गवाह
प्रस्तुत नहीं
किया, जो यह
प्रमाणित कर
सके कि शिक्षिका
ने सार्वजनिक रूप
से उसके विरुद्ध
मानहानिकारक बयान
दिए थे।
बचाव पक्ष ने
कक्षाओं की
दीवारों पर
लिखे गए कथित
अपमानजनक नारों
से संबंधित आरोपों
को भी चुनौती
दी।
यह तर्क प्रस्तुत
किया गया कि
ऐसा कोई विश्वसनीय
साक्ष्य उपलब्ध
नहीं था, जिससे
यह सिद्ध हो
सके कि उक्त
नारे शिक्षिका ने
स्वयं लिखे थे
अथवा किसी अन्य
व्यक्ति को
लिखने के लिए
उकसाया था।
न्यायालय के चार महत्वपूर्ण निष्कर्ष
1. कथित मानहानिकारक शब्दों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया
न्यायालय ने
पाया कि शिकायतकर्ता
उन सटीक शब्दों
को बताने में
असफल रहा, जो
कथित रूप से
आरोपी शिक्षिका द्वारा
कहे गए थे।
अदालत ने माना
कि जब कथित
शब्द ही स्पष्ट
नहीं हैं, तो
यह निर्धारित करना
संभव नहीं है
कि वे मानहानिकारक
थे या नहीं।
2. स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी गवाहों का अभाव
न्यायालय ने
पाया कि शिकायतकर्ता
ने अपने आरोपों
की पुष्टि के
लिए कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह प्रस्तुत
नहीं किया।
विशेष रूप से,
शिकायतकर्ता की
अनुपस्थिति में
कथित रूप से
कही गई बातों
के संबंध में
प्रस्तुत साक्ष्य
सुनी-सुनाई जानकारी
पर आधारित थे।
3. दीवारों पर लिखे नारों से शिक्षिका का संबंध सिद्ध नहीं हुआ
अदालत ने पाया
कि ऐसा कोई
साक्ष्य नहीं
था, जिससे यह
प्रमाणित हो
सके कि शिक्षिका
ने स्वयं कक्षाओं
की दीवारों पर
अपमानजनक नारे
लिखे थे अथवा
किसी अन्य व्यक्ति
को ऐसा करने
के लिए प्रेरित
किया था।
4. केवल संदेह के आधार पर अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता
न्यायालय ने
स्पष्ट किया कि
मात्र संदेह, अनुमान
और अटकलें किसी
व्यक्ति को
आपराधिक रूप
से दोषी ठहराने
के लिए पर्याप्त
नहीं हैं।
अदालत ने माना—मानहानि का आरोप सिद्ध नहीं हुआ
अपने निर्णय के
पैराग्राफ 13 में
न्यायालय ने
महत्वपूर्ण टिप्पणी
करते हुए कहा:
"मेरे
निष्कर्ष के
अनुसार, यह सिद्ध
करने के लिए
साक्ष्य का
पूर्ण अभाव है
कि आरोपी ने
किसी भी प्रकार
से शिकायतकर्ता की
मानहानि की
थी।"
इसके परिणामस्वरूप न्यायालय ने शिक्षिका को भारतीय दंड संहिता की धारा 500 के अंतर्गत आपराधिक मानहानि के आरोप से बरी कर दिया।
फैसले का कानूनी महत्व
यह निर्णय आपराधिक
न्याय व्यवस्था के
एक महत्वपूर्ण सिद्धांत
को पुनः रेखांकित
करता है कि
केवल सामान्य आरोपों, संदेह अथवा सुनी-सुनाई बातों के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक मानहानि का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
यह फैसला यह
भी दर्शाता है
कि किसी आपराधिक
मुकदमे में आरोपों
की स्पष्टता, विश्वसनीय
साक्ष्य और
प्रभावी जिरह
का अत्यंत महत्वपूर्ण
स्थान होता है।
13 वर्ष
से अधिक समय
तक आपराधिक मुकदमे
का सामना करने
के बाद यह
फैसला शिक्षिका के
लिए एक बड़ी
राहत लेकर आया
है।
इस मुकदमे में अधिवक्ता अनुज अग्रवाल ने शिक्षिका की ओर से सफलतापूर्वक पैरवी की। साक्ष्यों के अभाव के संबंध में उनके द्वारा प्रस्तुत महत्वपूर्ण दलीलें न्यायालय के निष्कर्षों में भी परिलक्षित हुईं।
पूरा फैसला पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:
अनुज अग्रवाल एंड कंपनी
अधिवक्तागण (ADVOCATES)
जंगपुरा कार्यालय
K-17, द्वितीय
तल,
जंगपुरा एक्सटेंशन,
नई दिल्ली – 110014
दिल्ली उच्च न्यायालय चैंबर्स
483, ब्लॉक-II,
लॉयर्स चैंबर्स,
दिल्ली उच्च न्यायालय,
नई दिल्ली – 110003
मोबाइल: +91 9891403206
ईमेल:
वेबसाइट:
https://advocateanujaggarwal.com/home.php
निर्णय का विवरण: एस.के. सक्सेना बनाम भारती शर्मा, शिकायत वाद संख्या 515362/2016, निर्णय दिनांक 28 सितंबर 2026, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी–06, मध्य जिला, तीस हजारी न्यायालय, दिल्ली।

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