अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से शामिल किए जाने पर प्रतीक्षा सूची की अवधि समाप्त होना राहत से इनकार का आधार नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट
अयोग्य अभ्यर्थियों को योग्य अभ्यर्थियों के साथ प्रतिस्पर्धा में नहीं रखा जा सकता; प्रशासन अपनी चयन-प्रक्रिया की गलती को जारी रखने के लिए पैनल की अवधि समाप्त होने का सहारा नहीं ले सकता
नई दिल्ली, 13 अगस्त: सरकारी नियुक्तियों और प्रतीक्षा सूची के संचालन से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि जहाँ चयन प्रक्रिया में किसी अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से शामिल किया गया हो, वहाँ केवल इस आधार पर किसी योग्य अभ्यर्थी को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता कि प्रतीक्षा सूची की वैधता अवधि समाप्त हो चुकी है।
न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति अमित महाजन की खंडपीठ ने मोनिका मेहर द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार कर लिया। मोनिका मेहर अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग की अभ्यर्थी थीं और उन्होंने दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय में पीजीटी (इतिहास) (महिला) पद पर नियुक्ति की मांग की थी। हाई कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को परिणामी राहतें प्रदान कीं।
इस निर्णय में अदालत ने एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। सामान्यतः किसी प्रतीक्षा सूची या चयन पैनल को उसकी निर्धारित वैधता अवधि समाप्त होने के बाद संचालित नहीं किया जा सकता। लेकिन इस सिद्धांत को यांत्रिक रूप से उस स्थिति में लागू नहीं किया जा सकता, जहाँ किसी योग्य अभ्यर्थी की मेरिट अथवा प्रतीक्षा सूची में स्थिति इसलिए नीचे चली गई हो क्योंकि एक अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से चयन प्रक्रिया में शामिल होने दिया गया और उसे पैनल में स्थान दे दिया गया।
यह विवाद DSSSB द्वारा पीजीटी (इतिहास) (महिला), पोस्ट कोड 79/20 के लिए की गई भर्ती से उत्पन्न हुआ। अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए पाँच पद आरक्षित थे। मोनिका मेहर ने चयन प्रक्रिया में भाग लिया और उन्हें रिजर्व पैनल में रखा गया।
प्रारंभ में ST वर्ग के पाँच अभ्यर्थियों का चयन हुआ और अंजू मीना को याचिकाकर्ता से ऊपर प्रतीक्षा सूची में स्थान दिया गया। बाद में 18 अक्टूबर 2022 को चयनित अभ्यर्थी सविता मीना की उम्मीदवारी रद्द कर दी गई। उस समय पैनल अभी वैध था। इसके बाद रिक्त पद अंजू मीना को दिया गया और मोनिका मेहर प्रतीक्षा सूची में प्रथम स्थान पर आ गईं।
बाद में अंजू मीना की उम्मीदवारी भी रद्द कर दी गई। दस्तावेजों की जांच से यह सामने आया कि उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से एक ही समयावधि में एम.ए. (इतिहास) और बी.एड. पाठ्यक्रम किए थे, जिसके कारण उन्हें अयोग्य माना गया। इसके परिणामस्वरूप एक पद रिक्त रह गया।
DSSSB ने मोनिका मेहर के दावे का विरोध करते हुए कहा कि अंजू मीना की उम्मीदवारी रद्द होने तक एक वर्ष की पैनल अवधि समाप्त हो चुकी थी। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने इस दलील को स्वीकार करते हुए मोनिका मेहर की याचिका खारिज कर दी थी।
दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता अनुज अग्रवाल ने तर्क दिया कि मामला वास्तव में समाप्त हो चुकी प्रतीक्षा सूची को पुनः संचालित करने का नहीं था। असली मुद्दा यह था कि एक अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से एक योग्य अभ्यर्थी से ऊपर स्थान दे दिया गया था। यदि अयोग्य अभ्यर्थी को सही समय पर बाहर कर दिया गया होता, तो मोनिका मेहर प्रतीक्षा सूची में ऊपर आ जातीं और उस समय उत्पन्न रिक्ति के विरुद्ध चयनित हो जातीं, जब पैनल अभी प्रभावी था।
हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार किया।
खंडपीठ ने कहा कि यद्यपि यह सामान्य सिद्धांत स्थापित है कि किसी पैनल को उसकी वैधता अवधि से आगे संचालित नहीं किया जा सकता, लेकिन उस स्थिति में अलग सिद्धांत लागू होगा जहाँ पैनल स्वयं दोषपूर्ण हो, क्योंकि उसमें किसी अयोग्य अभ्यर्थी को गलत तरीके से शामिल किया गया हो।
अदालत ने विशेष रूप से इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या केवल पैनल की अवधि समाप्त हो जाने के कारण राहत से इनकार किया जा सकता है, जबकि यदि अयोग्य अभ्यर्थी को शामिल नहीं किया गया होता तो याचिकाकर्ता चयन सूची में आ गई होती।
अपने पूर्व निर्णय State (NCT of Delhi) v. Shabana Parveen पर भरोसा करते हुए हाई कोर्ट ने दोहराया कि जहाँ किसी अभ्यर्थी की अयोग्यता चयन सूची तैयार करते समय ही पता लगाई जा सकती थी, वहाँ प्रशासन अपनी ही गलती का लाभ नहीं उठा सकता।
अदालत ने पाया कि अंजू मीना को प्रतीक्षा सूची में शामिल करना स्पष्ट रूप से गलत था और प्रतिवादी यह संतोषजनक रूप से नहीं बता सके कि आवश्यक शैक्षणिक योग्यता न होने के बावजूद उन्हें सूची में क्यों शामिल किया गया।
खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि चयन सूची तैयार करते समय यदि “सामान्य स्तर की सावधानी” भी बरती गई होती, तो अंजू मीना प्रतीक्षा सूची में शामिल नहीं होतीं और मोनिका मेहर प्रथम प्रतीक्षा सूची अभ्यर्थी होतीं।
इस फैसले का महत्व इस बात में है कि अदालत ने स्पष्ट किया कि योग्य अभ्यर्थियों को ऐसे व्यक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने या उनकी गलती का नुकसान उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो चयन प्रक्रिया की शुरुआत से ही अयोग्य थे।
प्रतीक्षा सूची की अवधि समाप्त होने को ऐसी प्रशासनिक गलती के परिणामों को बनाए रखने के लिए तकनीकी बचाव के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अंततः CAT के आदेश को रद्द कर दिया और रिट याचिका को परिणामी राहतों सहित स्वीकार कर लिया।
मामला: Monika Mehar v. Govt. of NCT of Delhi & Ors.
मामला संख्या: W.P.(C) 2731/2025
न्यायालय: दिल्ली हाई कोर्ट
पीठ: न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर एवं न्यायमूर्ति अमित महाजन
निर्णय की तारीख: 13 अगस्त 2026
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता: अनुज अग्रवाल एवं उनकी टीम
अनुज अग्रवाल
अधिवक्ता
K-17, द्वितीय तल, जंगपुरा एक्सटेंशन, नई दिल्ली – 110014
483, ब्लॉक-II, लॉयर्स चैंबर्स, दिल्ली हाई कोर्ट, नई दिल्ली – 110003
मोबाइल: 9891403206
ईमेल: anujaggarwal1984@gmail.com, anujaggarwalcompany@gmail.com
वेबसाइट: advocateanujaggarwal.com

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